ऐ खुदा शुक्रिया !
बहुत कुछ दिया तूने ;बिन मांगे।
लोग तो पूजा करते हैं ...
मन्नतो का अम्बार लगाते हैं तब जाकर ...
उनकी एक -आध ख्वाईश ....
अपने मुकाम को हासिल कर पाती है।
और
फिर मैं ठहरा - निरा स्वार्थी ....
तुम्हारी लम्बी-चौड़ी पूजा तो ...
मेरे बस की बात नहीं थी -तो
मैंने भी तुझे खुश करने के लिए ;
कुछ हट के करने की कोशिश की ...
और लगता है कि -
शायद तू खुश हो गया।
कुछ ज्यादा ....
धरम करम नहीं किया बस ...
जिन बुजुर्गों को उनकी औलादें नकारती हैं ...
मैंने उन्हें अपनाया।
गाय को अपना जूठन नहीं खिलाया बल्कि ...
जो मैंने खाया ....
वह खिलाया।
कुत्ते को -फेंक कर रोटी नहीं दी बल्कि .....
रख कर दी ;
और
देश को सदा पहले पायदान पर रखा और
हिन्दू मुसलमान के पचड़े से दूर रहा।
मैंने तय किये -अपने मायने ...
क्यों की ज़िन्दगी मेरी थी।
मैंने तय किये ...
अपनी मोहब्बत के पैमाने ....
क्यों कि मोहब्बत मेरी थी।
मैंने तय किये ....
अपने दोस्त और दोस्तियां ....
क्यों कि -वफादारियां मेरी थी।
और
मैंने तय की ....
अपनी तहजीबें ...
क्यों कि संस्कार मेरे माँ -बाप के थे।
मैं नहीं कहता की-दूध का धुला हूँ पर .....
स्याही सा काला भी नहीं हूँ।
ईमानदारी का भगवान् नहीं ....
तो बैईमानी का मसीहा भी नहीं हूँ।
शायद इसी कारण तूने
दे दिए दो प्यारे से बच्चे और
निर्मल सी जीवन संगनी ...
बिन मांगे ;
कुछ मेरे भाग्य से ....
तो कुछ माँ पापा की दरख्वास्त से .....
तो कुछ -तूने
अपने स्नेह और विश्वास से।
बड़े बड़े करोड़पतियों को देखा है मांगते -एक बेटा ...
बड़े बड़े लोगों को देखा है -बेमेल रिश्तों को ढोते .....
और खोदते ....
रिश्तों की खाईयां ...
बहुत गहरी ...
फिर
मैं तो बहुत खुश हूँ जो ...
तेरी नज़रे इनायत मुझ पर हुई।
कटोरे में खुशियां तलाशोगे ....
तो दिख जायेगीं और
खालीपन ढूँढोगे तो .....
वो भी -कहीं न कहीं ....
नज़र आ ही जाएगा।
कोई आधे चाँद में ही ....
दो आंसू बहा कर ...
अपनी मोहब्बत को ....
याद कर लेता है ....
तो कोई -
अमावस की ....
काली रात का इंतज़ार करता है ;
रोने को।
पूरनमासी के चाँद की चाह में ...
आधे-अधूरे चाँद को ....
नकारना ;बेवकूफी है।
समझदार वही है -जिसने ...
आधे चाँद में ...
तारों से दोस्ती कर के ;
ज़िन्दगी गुज़ारी।
म्याद पूरी करना है ....
उस ज़िन्दगी की ....
जो तूने दी है ...
बड़े विश्वास से।
और देखना ...
जब लौट कर दूंगा हाज़री ....
तेरे दरबार में ...
तो तू भी मुस्करा देगा ....
मेरे फैसलों पर।
बहुत कुछ दिया तूने ;बिन मांगे।
लोग तो पूजा करते हैं ...
मन्नतो का अम्बार लगाते हैं तब जाकर ...
उनकी एक -आध ख्वाईश ....
अपने मुकाम को हासिल कर पाती है।
और
फिर मैं ठहरा - निरा स्वार्थी ....
तुम्हारी लम्बी-चौड़ी पूजा तो ...
मेरे बस की बात नहीं थी -तो
मैंने भी तुझे खुश करने के लिए ;
कुछ हट के करने की कोशिश की ...
और लगता है कि -
शायद तू खुश हो गया।
कुछ ज्यादा ....
धरम करम नहीं किया बस ...
जिन बुजुर्गों को उनकी औलादें नकारती हैं ...
मैंने उन्हें अपनाया।
गाय को अपना जूठन नहीं खिलाया बल्कि ...
जो मैंने खाया ....
वह खिलाया।
कुत्ते को -फेंक कर रोटी नहीं दी बल्कि .....
रख कर दी ;
और
देश को सदा पहले पायदान पर रखा और
हिन्दू मुसलमान के पचड़े से दूर रहा।
मैंने तय किये -अपने मायने ...
क्यों की ज़िन्दगी मेरी थी।
मैंने तय किये ...
अपनी मोहब्बत के पैमाने ....
क्यों कि मोहब्बत मेरी थी।
मैंने तय किये ....
अपने दोस्त और दोस्तियां ....
क्यों कि -वफादारियां मेरी थी।
और
मैंने तय की ....
अपनी तहजीबें ...
क्यों कि संस्कार मेरे माँ -बाप के थे।
मैं नहीं कहता की-दूध का धुला हूँ पर .....
स्याही सा काला भी नहीं हूँ।
ईमानदारी का भगवान् नहीं ....
तो बैईमानी का मसीहा भी नहीं हूँ।
शायद इसी कारण तूने
दे दिए दो प्यारे से बच्चे और
निर्मल सी जीवन संगनी ...
बिन मांगे ;
कुछ मेरे भाग्य से ....
तो कुछ माँ पापा की दरख्वास्त से .....
तो कुछ -तूने
अपने स्नेह और विश्वास से।
बड़े बड़े करोड़पतियों को देखा है मांगते -एक बेटा ...
बड़े बड़े लोगों को देखा है -बेमेल रिश्तों को ढोते .....
और खोदते ....
रिश्तों की खाईयां ...
बहुत गहरी ...
फिर
मैं तो बहुत खुश हूँ जो ...
तेरी नज़रे इनायत मुझ पर हुई।
कटोरे में खुशियां तलाशोगे ....
तो दिख जायेगीं और
खालीपन ढूँढोगे तो .....
वो भी -कहीं न कहीं ....
नज़र आ ही जाएगा।
कोई आधे चाँद में ही ....
दो आंसू बहा कर ...
अपनी मोहब्बत को ....
याद कर लेता है ....
तो कोई -
अमावस की ....
काली रात का इंतज़ार करता है ;
रोने को।
पूरनमासी के चाँद की चाह में ...
आधे-अधूरे चाँद को ....
नकारना ;बेवकूफी है।
समझदार वही है -जिसने ...
आधे चाँद में ...
तारों से दोस्ती कर के ;
ज़िन्दगी गुज़ारी।
म्याद पूरी करना है ....
उस ज़िन्दगी की ....
जो तूने दी है ...
बड़े विश्वास से।
और देखना ...
जब लौट कर दूंगा हाज़री ....
तेरे दरबार में ...
तो तू भी मुस्करा देगा ....
मेरे फैसलों पर।

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