ओ शास्वत सत्य !
ओ अर्ध्य सत्य !
ओ जन्म और मृत्यु के सृजक !
ओ कालजई !
ओ अनाम परछाईं !
कितनी उपाधियाँ और कितने नाम दूँ ;तुम्हें ?
पर
भगवान नहीं कहूँगा।
और
बातें करता चला जाऊँगा .....
बेतुकी ....
बेतकुल्लफी के साथ ;
क्यों कि
अब मेरा -तुम से ....
कुछ ज्यादा -स्वार्थ बचा नहीं।
और जब स्वार्थ न रहे ....
तभी मोहब्बत -
अपना मुकाम ...
हासिल करती है।
मुझे नहीं पता तुम हो के नहीं ?
कभी न देखा न सुना ?
कभी न तुम खुद मिले न बुलाया ?
बस यूँ ही ...
देखा था तुम्हें -बचपन से ...
अपने घर के -पूजा घर में ... तो
पूजता और मानता चला जा रहा हूँ ;मैं भी ;
इस अंतहीन यात्रा के लम्बे सफर में
पथिक बन के .....
कि यकीनन -
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर ....
तुम खुद आओगे ....
मुझसे मिलने और
कहोगे कि -
कैसा रहा यह सफर ????
पर हे मेरे प्रश्न चिन्ह !
कभी तो उत्तर दे दिया करो ;
अपने वज़ूद का ....
अपने आकार का ?
अपने लिबास का ?
जब दुनियां तुम्हें ही
प्रश्न चिन्ह लगा कर पूंछने लगे कि -
आप कौन ?
अब बहुत दिन हो गए -
सुनते सुनते कि -
राजा राम ने अवतरण लिया था इस पृथ्वी पर ;
या किशन कन्हैया ने कभी बांसुरी भी बजाई थी ;
पर -
अब ये किस्से थोड़ा पुराने हो गए हैं और ...
प्लीज -
एक बार दुबारा आकर ...
लगा दो हम जैसे अनगिनित लोगों के -
मुह पर -पूर्ण विराम !
अगर आप -अल्ल्हा मियां ,गुरुनानक साहिब और जीजस महोदय
सब एक हैं [
और
ऊपर आप जैसे लोगों का कोई -यूनियन है ;
तो हमें भी तो बताओ ?
हम बेफाल्तू में लड़ लड़ कर
मरे जा रहे हैं ?
फिर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि -
आप किस पार्टी में हैं या -
आप आरएसएस के साथ हैं या वामपंथियों के साथ ?
मुझे तो बस इतना मालुम है कि -
आपके पास -
हमारा रिमोट कंट्रोल है और -
वही होता है -जैसा ....
आप चाहते हैं।
रही बात मेरी तो -
हे मेरे शंकर !
थोड़ा परेशान हूँ ...
थोड़ा सशंकित और थोड़ा डरा हुआ कि -
वक़्त कम ही बचा है ...
पेपर देते देते ....
ज़िन्दगी निकल गई है पर
रिजल्ट नहीं खुला !
देखना मेरे शंकर !
मेरे शम्भू !मेरे महा देव !
सपने ;सपने न रह जाएँ !
दूसरी पीढ़ी .....
फिर मेरे जैसे .....
सपने न बुने ..... पर
मेरे सपनों में -
हकीकत के रंग भरें।
और
उस रंग भरी सफलता के -
पूजा घर में ....
तुम्हारी तस्वीर के नीचे ...
किसी कोनें में ;
तुम्हारे चरणों की धुल तले ...
कहीं मेरा बेटा ;
एक दिया ;
मेरे नाम का भी -
उदीप्त कर रहा हो ...
इस भाव से कि -
उसके पापा ने ...
अपना कर्तव्य किया !!!
कभी समय मिले -
तो अहसास कराना कि -
तुमने मेरी चिट्ठी पढ़ ली है और -
जल्दी ही मेरा रिजल्ट भी
लौटती डाक से
भेज रहे हो !
आपका हमेशा -
शानू !
ओ अर्ध्य सत्य !
ओ जन्म और मृत्यु के सृजक !
ओ कालजई !
ओ अनाम परछाईं !
कितनी उपाधियाँ और कितने नाम दूँ ;तुम्हें ?
पर
भगवान नहीं कहूँगा।
और
बातें करता चला जाऊँगा .....
बेतुकी ....
बेतकुल्लफी के साथ ;
क्यों कि
अब मेरा -तुम से ....
कुछ ज्यादा -स्वार्थ बचा नहीं।
और जब स्वार्थ न रहे ....
तभी मोहब्बत -
अपना मुकाम ...
हासिल करती है।
मुझे नहीं पता तुम हो के नहीं ?
कभी न देखा न सुना ?
कभी न तुम खुद मिले न बुलाया ?
बस यूँ ही ...
देखा था तुम्हें -बचपन से ...
अपने घर के -पूजा घर में ... तो
पूजता और मानता चला जा रहा हूँ ;मैं भी ;
इस अंतहीन यात्रा के लम्बे सफर में
पथिक बन के .....
कि यकीनन -
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर ....
तुम खुद आओगे ....
मुझसे मिलने और
कहोगे कि -
कैसा रहा यह सफर ????
पर हे मेरे प्रश्न चिन्ह !
कभी तो उत्तर दे दिया करो ;
अपने वज़ूद का ....
अपने आकार का ?
अपने लिबास का ?
जब दुनियां तुम्हें ही
प्रश्न चिन्ह लगा कर पूंछने लगे कि -
आप कौन ?
अब बहुत दिन हो गए -
सुनते सुनते कि -
राजा राम ने अवतरण लिया था इस पृथ्वी पर ;
या किशन कन्हैया ने कभी बांसुरी भी बजाई थी ;
पर -
अब ये किस्से थोड़ा पुराने हो गए हैं और ...
प्लीज -
एक बार दुबारा आकर ...
लगा दो हम जैसे अनगिनित लोगों के -
मुह पर -पूर्ण विराम !
अगर आप -अल्ल्हा मियां ,गुरुनानक साहिब और जीजस महोदय
सब एक हैं [
और
ऊपर आप जैसे लोगों का कोई -यूनियन है ;
तो हमें भी तो बताओ ?
हम बेफाल्तू में लड़ लड़ कर
मरे जा रहे हैं ?
फिर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि -
आप किस पार्टी में हैं या -
आप आरएसएस के साथ हैं या वामपंथियों के साथ ?
मुझे तो बस इतना मालुम है कि -
आपके पास -
हमारा रिमोट कंट्रोल है और -
वही होता है -जैसा ....
आप चाहते हैं।
रही बात मेरी तो -
हे मेरे शंकर !
थोड़ा परेशान हूँ ...
थोड़ा सशंकित और थोड़ा डरा हुआ कि -
वक़्त कम ही बचा है ...
पेपर देते देते ....
ज़िन्दगी निकल गई है पर
रिजल्ट नहीं खुला !
देखना मेरे शंकर !
मेरे शम्भू !मेरे महा देव !
सपने ;सपने न रह जाएँ !
दूसरी पीढ़ी .....
फिर मेरे जैसे .....
सपने न बुने ..... पर
मेरे सपनों में -
हकीकत के रंग भरें।
और
उस रंग भरी सफलता के -
पूजा घर में ....
तुम्हारी तस्वीर के नीचे ...
किसी कोनें में ;
तुम्हारे चरणों की धुल तले ...
कहीं मेरा बेटा ;
एक दिया ;
मेरे नाम का भी -
उदीप्त कर रहा हो ...
इस भाव से कि -
उसके पापा ने ...
अपना कर्तव्य किया !!!
कभी समय मिले -
तो अहसास कराना कि -
तुमने मेरी चिट्ठी पढ़ ली है और -
जल्दी ही मेरा रिजल्ट भी
लौटती डाक से
भेज रहे हो !
आपका हमेशा -
शानू !

No comments:
Post a Comment