कभी कभी....
ट्रैन से गंतव्य की ओर जाते हुए -
स्टेशन पर -
ट्रैन की सूनी सूनी खिड़की पर...
याद आती हैं...
वे परछाइयाँ...
जो हवा की मानिंद उड़
गई हैं-
बहुत दूर....
अब नहीं खड़े हैं-
कोई अपने...
जो देते रहते थे - समझाइश-
"ऐसा करना ऐसा न करना "
और बढ़ाते थे-
हौसंला की-
"पैसे की चिंता मत करना और पढ़ाई दिल लगा कर करना...
चिट्ठी डालना ...
कोई दिक्कत हो तो टेलीग्राम करना...."
मैं भी फिर....
धीरे से कहता-
"पापाजी आपकी "हार्ट प्रॉब्लम" को ग्वालियर में दिखलाना है "
और वे कहते -
तू "मेरी चिंता मत करना-वो तो चलता रहता है ; तुम अच्छा बन जाओ तो समझ लो मेरी सारी बीमारी ठीक हो गई!"
अब बिन पापा...
न वे बातें...
न ढांढस बढ़ाने वाले हाथ....
सिर्फ यादें...
सिर्फ यादें और ट्रैन से मंज़िलों की तरफ अकेला जीवन सफर!!
शुभ रात्रि!
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