Friday, March 11, 2016

मैंने देखा है...


                                                                         मैंने देखा है...
एक "साइकिल" चलाते इंसान को- "मोटरसाइकिल" -बड़ी "फितरत" से निहारते हुए... 

मैंने देखा है-
खेत बोते किसान को.. 
बैलगाड़ी पर बैठ -बैलों को सहला कर -
ट्रेक्टर निहारते हुए...

मैंने देखा है... 
कार के बाहर खड़े गरीब मासूम बच्चे को -
बड़े "कौतुहल" से कार को छूकर देखते हुए...

मैंने देखा है.. 
सरकारी स्कूल से लौटते बच्चे को... 
चाट की दूकान पर दो रुपये की पानी पूरी पीते हुए...

मैंने देखा है -
बस में बैठे बच्चे को 
दूर से "कोल्ड ड्रिंक" पीते दुसरे ; थोड़ा संपन्न बच्चे को देखते हुए...

मैंने देखा है... 
कुछ गरीब बच्चों को... 
"इलेक्ट्रॉनिक्स" दुकानों के बाहर -
रंगीन टेलीविज़न को देखते हुए!

मैंने देखा है -
मज़दूर को मोबाइल की दुकान पर -डरते डरते 
मोबाइल का "रेट" पूंछते हुए?

मैंने देखा है...
"बाइक" पर शहर के 
बाहर -"मोहब्बत" को अपने साथी के काँधे पर हाथ रखे या "सर" टिकाये हुए और शहर के भीतर -"अज़नबी" बन दूर बैठते हुए! 

मैंने देखा है...
भरे पूरे घर में -
अस्सी बरस के बुज़ुर्ग पिता को पैरों में दर्द होने पर खुद तेल लगाते हुए!

सच! 
बहुत करीब से देखा है -
"बेबसी" को -"ख्वाइशों" की दहलीज़ पर -एड़ियां रगड़ते हुए! 
अक्सर "बेबसी" गरीबी का लबादा पहन कर तलाशती रहती है -जीवन की छाँव ;
"धुप" को पीछे धकेल कर!

हाँ! यह अलग बात है की कभी कभी...
मिलजाते हैं 
इसी अनादि यात्रा में -
      "सुदामा" को -"श्री कृष्णा" और "शबरी" को -"श्री राम"!! "

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