महिला दिवस पर समर्पित !!!
प्रिय!
"भूंख ही तो है ;
जो मिटाती रही हो तुम...
इस धरती पर...
और मिटाती रहोगी ...
युगों युगों से...
प्रकृति के अंतिम चरण तक...
तुम्हारी ही रचनात्मकता और सृजनशीलता से.... इस धरती ने....
पाया है....
गर्भ के भीतर जीवनांकुर....
और माँ की सारगर्भित उपाधि!!
चूल्हे की रोटी से लेकर... नव-जीवन के स्पंदन तक....
आंसुओं के ढलकने से.... गेसुओं के टपकने तक...
आँगन की तुलसी से.. ममता के आँचल तक..
प्रेम के आलिंगन से... अंतिम श्नवास तक;
तेरा ही वज़ूद छा -
गया है सारी कायनात पर.....
धुंआ धुंआ सा...
बन कर....
जड़ से जमीन तक...
जमीन से आसमान तक... और
प्रथम स्नान से अंतिम प्रस्थान तक....
सिर्फ "तुम ही तुम" तो छाई हो....
इस अधीर,निर्बल और निर्लज्जः
मानव के चारों और..
धीरज, प्रेम और लज्जा का शक्तिपुंज बन कर!!
हे सृष्टि! हे जननी!
तुम ही मिटा रही हो...
भूंख और प्यास...
बिना थकें बिना रुके...
इस हाड-मॉस के इंसान की! "
सादर नमन..
(गर्वित गौरव!)
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