Monday, February 29, 2016

बैलगाड़ी सी चली जा रही है - ज़िन्दगी!

बैलगाड़ी सी चली जा रही है ; हम दोनों की ज़िन्दगी!
दो बैलों की मानिंद....
लादे हुए ;
अपनी अपनी जिम्मेदारियां...
बड़ी संजीदगी से...
दुःख, शिकवा शिकायतों से..
बहुत दूर।।
और-
हमने अपनी
हसरतों को भी -
करीने से सजा कर रख दिया है ;
बहुत भीतर...
दिल की अनंत... गहराईयों में.... 
अगले जन्मों के लिए। 

मैं देख लेता हूँ...
अक्सर साथ चलते चलते...
सरसरी नज़र से...
तुम्हारी ढलती काया को...और...
मेरे कदम दर कदम...
मिला कर...
साथ-साथ
दुःख और सुख में...
चलने की जिजीविषा और जीवटता को!

अपनी बैलगाड़ी का...
बड़ा बैल होने के कारण....
जाहिर नहीं कर पाता हूँ... 
उस संभावित खालीपन और शुन्य को...
जो तुम्हें देख कर दिखने लगता है...
पथरीले रास्तों पर... ज़िन्दगी की थकी दोपहर की...
बैलगाड़ी को हांकते हांकते....

सच! साथ चलते चलते
डर लगने लगा है...
की -
बिना "साध्य को प्राप्य" किये-
ये बैलों की जोड़ी कहीं लड़खड़ा न जाए..
क्यों की अभी बछड़े बहुत छोटे हैं! 

खैर! अपने ऊपर तो ज्यादा नहीं...
पर उनपर...
बहुत ज्यादा.... विश्वास है
जो माँ-पापा...के रूप में 
अब बन बैठे हैं ; भगवान  ....
बहुत दूर.. बैकुंठ में....
और स्नेह से निहार रहे हैं...
अपनी बैलगाड़ी को!

अगर कभी भटकेंगे...
साथ चलते चलते...
तो वे संभाल लेंगे ;
हम दोनों को...हमारी नैया को
जिससे यह हमारी बैलगाड़ी...
अपनी मंज़िलों से...
भटक न पाये...

और देखना -"हम दोनों"
यूँ ही-जुगलबंदी
करते करते..
अपने गले की घंटी...
बजाते बजाते...
रोज़ सुबह शाम -
रम्भाते-रम्भाते
तय कर लेंगे -
ये दुश्वारियों की -
कठिन डगर।
(गर्वित गौरव!)

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