चेहरा
रोज़ बदलता हूँ किरदार..
रोज़ छुपाता हूँ चेहरे...
कभी गुलामी का चेहरा
कभी अफसरी का चेहरा।
कभी चापलूस..
कभी तीमारदार।
कभी खुशनुमा दोस्त..
कभी चिढ़चिढ़ा साथी।
रोज़ देता हूँ बेईमानों को गालियां...
रोज़ चढ़ाता हूँ ईमानदारी का नक़ाब।
रोज़ करता हूँ तारीफ़ हुक्मरां की..
और रोज़ खर्च होता जाता हूँ मै।
पर इस सब के बीच....
कहीं गिर गया है मेरा असली चेहरा..
रोज़ किरदार बदलते बदलते..
कहीं मिल जाये गर तुम्हे...
तो उठाकर रख लेना।
क्योंकि पहचान तो अब मै भी ना सकूँगा
कि कैसा दिखता हूँ मै असल में...
कौन सा है/था मेरा असली चेहरा..
कौन हूँ मै।
☺☺☺☺
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