झुकी झुकी सी पलकें अब नहीं शर्मातीं...
भीगे भीगे से होंठ अब नहीं भरभराते...
बुझे बुझे से ख्वाब अब नहीं डगमगाते...
उडी उडी सी जुल्फें अब चेहरे से नहीं टकरातीं...
सिसकतीं सिसकतीं सी रातें अब नहीं बाट जोहतीं....
सुलगते और पिघलते अरमान अब नहीं दहकते... और
मोहब्बतें अब ता उम्र इंतज़ार नहीं करतीं!
बदल गए हैं -फलसफे मोहबत्तों के... बदलते वक़्त के साथ!
प्यार करने वाले भी बहुत दिनों से दिखे नहीं -परेशान!
मोहब्बतें भी अब व्रत करतीं बदहवास...
मंदिरों की चौखट पे नहीं दिखतीं...
और फिर अब...
बाग़-बगीचों या गली चौबारों या छतों पर भी..
अब नहीं दिखती..
दिलों और नयनों की पतंगबाज़ी..
सच यकीनन...
कितनी बदल गई है -मोहब्बत!
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