"नफासत से रखा करो दिल में हिन्दुस्तानियत...
आज कल इसे छीनने वाले सरेराह घुमते रहते हैं...."
"खाना खाते हुए अक्सर ठहर जाती है -जुबां...
और...
मुह के निवाले में ढूंढने लगता हूँ -
उस नमक का स्वाद... जिस के खातिर...
झूल गये थे ;
फांसी पर..
तीन सिरफिरे -
भगत सिंह के साथ!
और
अभी अभी...
इसी "भारतीयता" ब्रांड के सफ़ेद नमक के खातिर...
सियाचीन की सफ़ेद बर्फ की चादर में सो गए -
दस जांबाज़!
शिखंडी,कंस,जयद्रथ और ब्रूटस की मानिंद
दिखतें हैं-
ये सियासतदान.....
जो पचा नहीं पा रहे हैं ; इस हकीकत को की -
अब उनके दिन लद गए... और
देश की रफ़्तार...
बदल रही है!
वे महा ज्ञानी तीसमारखां कहाँ गए...
जो खुद की पीठ पर
ज्ञानपीठ पुरूस्कार नहीं लाद पाये...
और लौटा गए उसे
बड़े सहिष्णु के ठेकेदार बन कर!
अरे पेशावर के पेशवाओं! जरा एक नज़र फेर कर उन शहीदों को भी देख लेते...
जिन्होंने अपनी पीठ और छाती पर चस्पा तिरंगे की खातिर प्राण दे दिए पर
तिरंगा नहीं गिरने दिया!
यही अंतर है -
एक शहीद की शहादत और डरपोक की फितरत में!!!!! "
(गर्वित गौरव!)
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