"कसम अब कोई नहीं खाता...
या यह कह लो की -
कसम अब कोई नहीं लेता...
जब वादे ही न रहे तो फिर कसमें कब तक ज़िंदा रहतीं?
माँ कसम..
विद्या कसम...
भगवन कसम...
सच्ची कसम से..
तेरी कसम...
जैसी बातें गुम गयीं हैं...
समय के आवेग में..
गुमशुदा बन कर!!!
फिर कब तक झूंठ-मूंठ की कसम चलती...
जब उसे -
लेने वाले ही कोई न हों!
प्यार, वफ़ा, नियत, ईमान और इंसानियत के दम पर ही तो वो...
चलती थी..
बहुत दूर ... बहुत लम्बा..
कभी कभी तो -
आजीवन!
फिर अब न वो प्यार करने वाली मोहब्बतें रहीं और न उन्हें थामने वाले मज़बूत वचन!
राख हो गए हैं -रिश्ते!
जब रिश्ते ही न होंगे तो फिर उन्हें बाँधने वाले बंधन क्यों रहें?
तुझे छोड़ने के बाद...
तुझे भूलने के बाद...
एक सिर्फ -तुझे दी हुई कसम ही तो थी ;
जिसने हमें उबार लिया है...
तेरी यादों से और वादों से!
(शानू!)
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