चारों तरफ नकाबपोश नज़र आने लगे...
ये हिन्दुस्तान में किसके झंडे लहराने लगे?
जो पैदायशी खाते रहे -इस मुल्क का नमक...
अब ये कहाँ का नमक बजाने लगे?
नमकहरामी की इन्तिहाँ तो देखो ग़ालिब...
पचास बरसों तक जिस कुर्सी पर बैठ कर करते रहे भारत पर शासन...
आज उसी कुर्सी को आँखें दिखाने लगे?
ये किसका नमक खाने लगे?
माना की बाप-दादों ने की होगी देश सेवा...
तो
तुमने भी कसर नहीं छोड़ी वसूलने में ; मेवा
अरे! खाओ पीओ और ऐश करो..
ये काम है देशप्रेम और सरफ़रोशी का...
यह नहीं काम कोई दिल्लगी या फ़लसफ़ी का!
कुरता-जीन्स पहन कर...
अधपकी दाढ़ी बढ़ा कर... दिल्ली की गलियों में तुम तिरंगे से नज़रें मिलाने लगे..
तिरंगे से नज़रें चुराने लगे?
अरे तुम किसका नमक खाने लगे?
तुम किसकी धोंस ज़माने लगे...
निहत्थे हो...
अकेले हो...तुम
देश प्रेम और तिरंगे के लिए...
दूसरों के पाले में खड़े...
दीखते बिलकुल -भद्दे हो
तुम...
तुम किसका नमक खाने लगे..
तुम क्यों तड़पड़ाने लगे?
तुम क्यों छटपटाने लगे?
कुछ देश हित में करना सीखो..
जो तिरंगे को आँख दिखाए...
उनसे लड़ना सीखो... भिड़ना सीखो...
तुम तिरंगे के खिलाफ नारेबाजी करते केंचुओं से...
हाथ मिलाने लगे?
बख़ूरदार!
तुम किसका नमक खाने लगे???
किसकी -एड़ी बजाने लगे???
(गर्वित-गौरव!)
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