अब और नंगा न करो मुझे....
बहुत नंगा हो चुका हूँ ; मैं!!!
अपनी ही नज़रों में...
कई हाथ नीचे...
जमींदोज़ हो चूका हूँ ;
मैं!!!
अपनी ही नज़रों में!
नाउम्मीदी का आलम -
ये है की....
शीशे में भी ;कई बरसों से नहीं देखा है ;
अपना अक्स!
अपनी ही नज़रों में!
लगता तो नहीं...
की कुछ दिखेगा ;
आइने में...
अपनी विद्रूपताओं के सिवाय ;
क्यूंकि-कारनामों की कालिख की मोटी ज़र्द ने......
बड़ी बेशर्मी से..
चेहरे से लेकर रूह तक...
बना लिया है ;
अपना घर!!
अपनी ही नज़रों में!!!
बदरंग,बदसूरत,भयावह कारगुज़ारियों का आलम तो देखो ग़ालिब....
आज अकेला खड़ा हूँ...
नितांत अकेला...
भरे-पूरे परिवार में -
अपनों के बीच!
इक जद्दोजहद के साथ
की -
वे मुझे स्वीकारें या
दुत्कारे!!!
अपनी ही नज़रों में!!!
सच!
कभी कभी लगता है की -
ज़िंदा लाश की मानिंद ...
घूमता रहता हूँ...
अपनी ही नज़रों में!!!
या खुदा!
अब तू ही बचा है... जिसकी नज़रों की बखत मुझे नहीं मालुम???
मेरे लिये तेरी नज़रों में नज़रे इनायत है या नज़रे खफा???
अब तू ही फैसला सुना दे...
की कितना गिर चूका हूँ.... मैं ; तेरी नज़रों में?
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