गुमा गुमा सा मेरा भारत !
बैलों के गले में -
अब नहीं बाँधी जाती -घंटी ....
बैलगाड़ी चलाने वाले 'हरकारे' भी
अब नहीं रागते कोई पुरानी तान
ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर डोलती बैलगाड़ी में -
अब नहीं डोलते-युवा मन ....
और ....
बैलगाड़ियों से -
अब दुल्हन विदा भी नहीं होती।
सच
"गुमा गुमा" सा हो गया है -मेरा भारत।
कड़क सदरी पहने 'बड़े फ्रेम' के चश्मे वाले-
'दादा जी' भी न जाने कहाँ गुम से गए हैं ?
और अपने दादा जी से -
टॉफी या चूरन या कुल्फी खाने की जिद्द और मनुहार करते
बच्चे भी न जाने कहाँ चले गए हैं ?
दादा जी की खतरनाक बेंत वाली छड़ी भी अब नहीं डराती और
दादी के आँचल में छुपने को अब -माँ-पापा के डर से
नाती भी नहीं आते।
सच धुआँ धुआँ सा हो गया है ;मेरा भारत।
इन्द्रधनुष भी अब कम निकलने लगा है ;
जिससे हम ज़िन्दगी के सतरंगी सपने बुनते थे।
बसंत भी अब नहीं आता .....
जहां पेड़ों की कोंपलें तो फूटती हीं थीं .....
वहीँ मोहबत्तें भी आश्याने तलाशतीं थीं?
फिर अब तूफ़ान और तेज़ बारिश भी .....
बिजली की चकाचोंध के साथ नहीं गरजती ?
'मोहबत्तों' की चुनरी भी अब हवा में नहीं उड़ती और
'बाहें' अब बारिश के भीगे आँचल का सहारा भी नहीं बनतीं ?
सच !
कितना "सूना सूना" सा हो गया है :मेरा भारत !
'टीचर्स डे' पर जहां 'सर' के यहां शुभकामनाओं की लम्बी 'भीड़' दिखती है ...
वहीँ बेचारे 'गुरूजी' अपने 'एक-आध' शिष्यों की 'बाट' जोहते रहते हैं ...
'पिता' के 'पैर' दबाते 'बच्चे' भी अब कम ही दिखते हैं ...
'माँ' का 'सिर' सहलाते और आयोडेक्स लगाते 'बच्चे' भी यदा कदा दिख ही जाते हैं .....
'बहिन' को 'पीहर' से विदा कराने भी अब 'भाई' नहीं जाते ....
बेचारी 'बहनें' खुद आ जातीं हैं ;'माँ-बाउजी' से मिलने !
और
पता नहीं कब ...
सबसे प्यारी वाली 'नानी' -
'मैटरनल मदर' हो गई ???
पता ही नहीं चला ?
सच !
कितना फीका फीका सा हो गया है ;मेरा भारत !
लेकिन कुछ आशाएं हैं ;जो ज़िंदा किये हैं -ज़िन्दगी को !
मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी को नारियल चढ़ाते लोग ...
सोमवार को मन चाहे वर के लिए व्रत करतीं मोहब्बतें ...
करवा चौथ पे चाँद की बाट जोहती सुहागिनें
और ईद पर -
हिन्दुओं को दावत पर न्योतते मुस्लिम भाई।
बताते हैं कि -
हम तलाश लेंगे ....
अपने भटके रास्ते ;खुद।
सच किसी शायर ने खूब कहा है कि -
"खण्डहर में कुछ दिए हैं टूटे हुए से .....
उन्हीं से काम चलाओ दोस्त !
बहुत उदास है ;रात !!!
[गर्वित गौरव]

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