Tuesday, January 30, 2018

जीवन प्रवाह! प्रकृति संग ये इंसान का शुभ विवाह !

हर बसंत ..
उजड़े झुके जीर्ण शीर्ण वृक्ष ..
और सूखी हुई टहनियां ..
तलाश ही लेती हैं ;
ओस की चंद ..
भीगी हुई बूंदें और ..
बाँझ हो चुके धरातल पे ..
आ जाती है ; नमी ..
रुमानियत बनकर ..
बसंती महक के साथ !

कुछ कुछ ..
इंसानों जैसी फितरत पाले ..
ये ठूंठ बनते नंगे पेड़ भी ..
तलाश ही लेते हैं ;
जीवन बीज ...
ज़िंदा रहने को ...
बेवजह ..
बसंत-हेमंत के नाम पे !

नंगे पहाड़ों पे -
दो चार खजूर के कंटीले पेड़ !
मरुस्थल में ..केक्टस के पौधे !
खारे समुन्दर में ..छोटा सा टापू !
नदी किनारे ..सूनी कश्ती और ..
उम्रदराज आँखों में ..
बिछड़े जीवन साथी की ..
लोप होती स्मृतियों से ..
सूखी हुई पोरों में ...
पथरा गए आंसू !
सब कभी ..
लहलहलाते बसंत के जीवंत गवाह थे ...
जो आज ..
कुम्हलाते बसंत के मूक साक्षी !

सच ...
कितना भयावह है ...
ये जीवन प्रवाह!
प्रकृति संग ये इंसान का शुभ विवाह !

(Gaurav! )

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