Monday, March 26, 2018

पुच्छल तारा !

"अपनी ...
छुद्र आकाश गंगा का ..
मैं ; इक नन्हा सा पुच्छल तारा !
न चमक ..न रौशनी ...
बस यूँ ही ...
लुढ़कता ढुढ़कता ..
आवारा ..
बेसहारा बंजारा !

पता ही नहीं ...
किसी से रौशनी लेनी है या
किसी को देनी ??
बस गफलतों से भरा सफर ...
मैं इक सिमटता नज़ारा ...
आवारा ,
बेसहारा बंजारा !

अपने वज़ूद की गरमी को ...
समेट कर ..
अपने अंतर्मन की धूल धूसरित दीवारों में ..
एक दिन टकरा जाऊँगा ...
धरती से ...
ठीक उन पुच्छल तारों की मानिंद ...
जो कुछ पल की चमक को ..
पाने की खातिर ...
दो पल चमक कर ..
राख बन ..
बिछ जाते हैं ..
धरती की तलहटी में !

देखना ...मैं भी ;
बिछ जाऊँगा ; इक दिन ...
इसी बाँझ धरती पर और
उर्वरा बीज बनूँगा ...
नव सृजन की संरचना का !"

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