तेरी ज़िन्दगी में -
खतरनाक था तो ...
खौफनाक था तो ..
और
खुबसूरत था तो ;
सब कुछ ....
तेरी ही देन थी ..
ऐ मेरी ...
कुछ पगडंडियों की....
साथी हमसफ़र !
समय समय पर-
मेरी कल्पनाओं को-
जो अल्प विराम,
विस्मय बोधक और प्रश्नचिन्ह
लगाती रहती थी तुम ;
विचारों को जो-
संबल और दिशा देती थी तुम ;
वही अब कुछ कुछ ...
सार्थकता के साथ साथ सफलता देने लगा है !
"बेचैनियां बाजार में ..
नहीं मिला करती प्रिये ;
बाँटने वाला कोई ...
बहुत नज़दीकी होता है !!"
(गौरव !)
No comments:
Post a Comment