आज भी ...
दोस्ती किये हुए हूँ ..
उस अँधेरे से ..
जिसका फायदा उठा कर ..
तू आज भी ..
ख़्वाबों में ..
मिलने चली आती है ..
मुझसे !
मुझे रातों ने ..
कभी नहीं सताया !
न रुलाया !
क्यूंकि
तू हमेशा मेरे साथ रही !
अंधेरों की घटाटोप अमावस में भी ...
रातकली बन !!
हम दोनों ने ..
उस जिद्द को ..
ज़िंदा रखा ..
जिसे हम ..
ज़िन्दगी कहते थे !
चाहत का अंत ..
सात फेरे नहीं और ..
मोहब्बत ;
फेरों की मोहताज़
नहीं !
अँधेरे में बहुत ताक़त है !
वो चाहे तो -
विश्वास बन जाए और ..
चाहे तो आघात !
जैसा मन होगा ..
वैसा तन !
उसमें बिचारे ..
अँधेरे का क्या कसूर ?
मैं ;चाँद और तारों का ...
रोज रात में ....
दीदार करता हूँ और ...
ठीक वैसे ही ..
तेरा भी !
हाँ बस ;
न उन्हें छू पाता हूँ और ..
न तुझे !
बस ...
दूर दूर से ही सही !
हम दोनों का कारवां ...
चल तो रहा है न ?
तू अपनी मंज़िल और ...
मैं अपनी !!
[Garvit Gaurav! ]
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