घनी गहराती रात और
टिक टिक करता ..
घडी का काँटा ..
सुबह की भोर से -
चंद फांसलों दूर ;
अहसास कराता ...
ज़िन्दगी के अंधेरों में -
सुबह की फतह का !
ऊपर काला आकाश और
तारों के बीच
तेज़ी से लपलपाती बत्तियों के साथ
दूरी नापता
गंतव्य की ओर जाता
हवाई जहाज !
अहसास कराता ..
इंसानी दिल के रिश्तों के बंधनों की
ताक़त का !
जो फितूर सा जोड़ता है ..
एक दूसरे को ...
जन्म जन्म तक !
और मैं अभागा ;
कलंकित काली स्याही सा ;
निशब्द ;
अपने प्रारब्ध से ;
ज़मीन से ताकता ...
आसमान में ...
दूसरों को
पूरा करते निज स्वप्न !
करवटें बदल ..
पहलू में समा जाते हैं ..
वे सारे ख्वाब ;
जो कभी ..
मेरे भी पंख थे !
यूँ ही ..
उगे थे ..
मेरी काया से ..
चाँद तारों को नापने की खातिर !
चल इस जन्म न सही
अगले जन्म
फिर कोशिश करेंगे जब
बाज़ बन
लम्बी उड़ान पर जाएंगे !
No comments:
Post a Comment