Sunday, July 27, 2014

मेरे पापा!

मेरे प्यारे पापा!

"शिद्दत से ढूंढ़ता हूँ आपको अपने अंदर.....
आपके जाने के इतने साल बाद भी....
आपका बेटा हूँ न!

जब जब कोई नीचा दिखाता है आपका कन्धा आपके बाजू याद आते हैं जहाँ अक्सर मैं चिपक कर सबकुछ भूल जाता था!

जब जब कोई ऊँचा उठाता है, सम्मान और इज़्ज़त देता है और कहता है -डाक्टर रूपेंद्र का बेटा है तो बरबस आँखों के बिनबुलाये आंसू आपको तलाशते हैं कि - काश आप होते!

जब गुस्से में झल्लाता हूँ तो सब कहते हैं कि - गुस्सा पापा पे गया है!

जब कोई चुनौती देता है तो कह देता हूँ कि -मेरी वल्दियत देख लेना ;टूटना मंजूर हैं झुकना नहीं!

और
जब लिखता हूँ.....
बोलता हूँ..... या
किसी के सामने झुक कर पैर छूता हूँ तो सब कहतें हैं कि-अपने पापा पे गया है!

मेरे प्यारे पापा!
आपके जाने के बीस साल बाद भी.....
रंगीला बन.......
रंगा हुआ हूँ
उन्हीं रंगों में -
जो आपने उकेरे थे ;
अपने 'शानू 'के अंतर्मन में!

हर 'पिता ' घबराता है जब बच्चे बड़े होते हैं,
क्यों कि-
यह पाठ तो पापा ने बताया नहीं था....
क्या करें?
उस पल.....
इस पल....
सच......
आप याद आतें हैं!

गिरुं तो आप?
टूटूं तो आप?
दुखी तो आप?
परेशान तो आप?

प्यार तो आप!
माँ तो आप!
पापा तो आप!
दिलासा तो आप!

ख़ुशी तो आप!
सफलता तो आप!
हंसी तो आप! और
सुख तो आप!

मन घबराता है....
आप जो नहीं हो......

बस....
हिम्मत देना की वो कर जाऊँ
जिससे कभी -
मैं भी......
आपके जैसा याद किया जाऊँ! "

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