Friday, July 25, 2014

कारगिल और काल !

"मुझे नहीं मालूम-
उन ऊँची चोटियों की बुलंदी ........
जिसे फतह करने के लिए  ………
पंद्रह साल पहले -
तुमने अपने आप को -
निछावर कर दिया था !

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
उस मिट्टी की गंध ओ खुशबू कैसी है -
जिसे बचाने के लिए
तुमने अपने ऊपर ;अपनी छाती पे
गोली झेली थी !

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
जहाँ चोटी पे जहाँ तुम्हारा खून गिरा और बहा था ;
अब वहां
क्या है ?

मुझे यह भी नहीं मालूम कि -
उन चूड़ियों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से टूटीं ?
उन सपनों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से खंडित हुए ?
उन हसरतों का क्या हुआ जो तुम्हारे जाने से अधूरी रह गयीं ?

बस मुझे यह मालुम है कि -
आज  …… सारा देश
तुम्हारे सम्मान में
नतमस्तक है।

आज   …… सारा देश
तुम्हारी शहादत पे
बलिहारी है।

उन बुलंद ऊँची चोटियों पे  ……
तिरंगा लहरा रहा है।

उन ऊँची चोटियों पे   ……
तुम्हारे चर्चे हैं।

उन गर्वित चोटियों पे  ……
तुम्हारी खुशबू है।

तुम चिंता मत करना  ……

तुम्हारी चूड़ियाँ -पथरा कर संकल्प बन गईं हैं।
तुम्हारे सपनें -हक़ीक़त का जामा पहन चुके हैं।
और   ....
हसरतें सच में   ……
हसरतें बन कर रह गई हैं  ....
अगले जन्म में   …
पूरी होने के लिए। "

नमन सहित   …
एक भारतवासी !




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