कहानी आसूं की!
दोस्तों के बीच आँख से
ढलकता -ये -"पानी" था या
"नौटंकी" था...
जब माँ बाप थे तो ये आँख से ढलकता हुआ- पानी ; "मोती" था...
मोहब्बत हुई और आँख के पानी में "दिल और दर्द" का जायका भी मिल गया और ये -बन गया... अश्क़!
ज़िन्दगी थोड़ा आगे चली और यथार्थ के धरातल ने इस बहते अश्क़ को बना दिया -"शुष्क और रश्क... सैलाब.. "
और फिर ढलती उम्र ने -दे दिया इसे.. नया नाम और पहचान -"अनुभवों का दरिया! "
(गर्वित गौरव!)
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