Monday, August 31, 2015

दर्द! तू कितना सर्द है रे!

दर्द!
तू न होता तो शायद मैं भी न होता... अपने इस नग्न स्वरूप में...

नग्न इस लिए...
क्यूंकि
इक तू ही है- जिसने
उतार कर फेंक दिए ;
मेरे सारे कपडे..
और
कर दिया मुझे अनावृत...
मेरे जीवन पटल पे...

जो झूंठी पहचान थी -मेरी और....
मैं बावरा हो कर..
सुलगा रहा था... जिसे
अपने जीवन की अंगीठी  समझ;
घमंड से...
तूने..
अपनी एक ही फुंकार में .. दिखा दी मुझे मेरी औकात!

सच यार!
नग्नता की अपनी भव्यता है..
न कुछ छुपाना...
न कुछ बताना...

वैसे ही...
दर्द का अपना मज़ा है!
थोड़ा सा जर्द और खालिश के साथ सर्द!

बहुत मज़ा आ रहा है तेरे साथ जीने में... ऐ हसीं दर्द!

कुछ दिनों के लिए जब चला जाता है तू ..
तो लगता है जैसे
ज़िन्दगी से ;
तपिश जाती रही और खलिश आती रही!

तू भी कसर न छोड़ना ऐ दर्द!
कर लेना अपनी साध पूरी..... और...
दे देना मुझे... अपने तस्सवुरर का वो तीखा जख्म....
जो कर दे 'तेरी' छाती ठंडी और फिर
तू पलट कर न देखे मुझे अगले जन्म में...
जब फिर मैं...
मोहब्बत करूँ! "
(गर्वित गौरव!)

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