Monday, August 10, 2015

मेरे जाने की तैयारी!

मेरे जाने की तैयारी! 

मेरे अपने ही कर रहे हैं.. तैयारी...
मेरी रुखसती की !

नादाँ इतना भी नहीं जानते की -
जो खुदा उनका है...
वो उतना मेरा भी
तो है...

विदेशों से चन्दन की
लकड़ी मंगवा कर...
बनवा रहे हैं... मेरे ताबूत  का ढक्कन...
कभी न खुलने के लिए...

आते हैं हर बार...
बड़े 'जोश ओ खरोश' से...
मेरी  मैयत की तैयारी
देखने..
और
जब देखते हैं -मुझे "रोगन जोश" की तरह -
बेतकुल्लुफ्फ़ ;लापरवाह तो.... लौट जाते हैं... मायूसी से....
की -
चमड़ी मोटी है...
आसानी से ज़िन्दगी से ; हार नहीं मानेगा!

महाभारत के षड़यंत्र की तरह...
हर महीने -इक्कठे होते है... मेरे बुज़दिल!

इक साथ-उपहास उड़ा कर... मेरा...
भोज के साथ; देखते हैं-
कितना फासला तय किया है...
मेरे वज़ूद ने -जमीदोज़ी के सफर में!

न जाने क्यों? कोन सा सुकून मिलता है..
मेरे अपने नकाबपोशों को...
जो -आ जाते हैं ;
मुझे नीचा दिखाने ;
हर बार...
और
छोड़ जाते हैं...
अपने विश्वस्त शकुनियो को... मेरा ध्यान रखने को!

हट बावले!
इतना भी नहीं जानते की-
मेरे पिता का साया अपनी पाक रूह के साथ...
आज भी-
फ़ना है.....
मेरे वज़ूद पर....
मेरी मलहम बन कर! "
अमीन!
(गर्वित गौरव!)

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