Sunday, August 30, 2015

सूनी कलाई!

"सूनी कलाई का भी अपना सुरूर है...
अपना ईमान है.. और
अपना इन्साफ है!

कम से कम किसी बहिन को धोके में तो नहीं रखा...
की हाँ मुसीबत में -
मैं तेरी ढाल बन जाऊँगा!

वादे जज्बे और प्यार को कल ही तुलते देखा है.. मैंने ;
मिठाई की दुकानों में...

बड़े जोर शोर से बोली लग रही थी,
पाव् भर, आधा किलो और एक किलो मिठाई देना...
अरे...
यह वाली राखी -पचास की तीन दे देना...

बचपन का प्यार...
मासूमियत, पावनता और सुहानापन...
दूर खड़े थे ;मुह लटकाये हुए और
दिखावा, शोशेबाजी और रिश्तों की दरार...
मना रही थी -रक्षाबंधन!

चलो अच्छा हुआ -
न अब ब्राह्मण भूखे रहे... और न सुदामा गरीब!

राखियां चलती रहें...
रिश्ते घिसटतै रहें...
अपनी फींकी फींकी खुशबू के साथ! "

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