"कभी अस्सी वर्ष के अकेले बुजुर्ग से पूछना -
क्या होता है -अकेलापन!
जीवन साथी के बिछड़ने
के बाद...
ठीक वैसी ही दिखती है
ज़िन्दगी..
जैसे कोई मोटरसाइकिल
एक पहिये के बिना...
जैसे आकाश में उड़ती पतंग डोर के बिना...
जैसे आसमान में चाँद चकोर बिना...
जैसे बहती हुई जीवन की नदी किनारों के बिना...
जैसे दाढ़ी बनाने का रेज़र ब्लेड के बिना...
सच बहुत तड़पता है यह एकांकीपन बिना तुम्हारे
जब...
जब चलना पड़े अकेले और सहारे के लिए... कोई बेटे का हाथ न हो...
जब खाना खाने के बाद.. पानी और चाहिए हो और कोई आवाज़ न सुने...
जब नहाते वक़्त चड्डी बनियान धोनी पड़े और घुटनों के दर्द के बावजूद छत पर जाना पड़े -फ़ैलाने...
जब रात को चाय पीने का मन करे और बहु बोले... शक्कर नहीं है.. और शुगर लेवल बढ़ जाएगा...
जब पींठ में खुजली हो और बेटे न समझे...
जब पिता भूखा हो और सामने बेटे खाना खाएं...
जब पिता पंखे में सोये और बेटे AC में...
जब कूलर की आवाज़ में
गुम जाए... पिता की पुकार...
जब पिता दर्द की पुकार पर पुत्र को बुलाये...
और बीवियां दरवाज़े बंद
कर लें... शोर और ध्वनि प्रदुषण से...
सच...
बड़ा कठिन है..
तुम्हारे बिना जीना... "
"कभी फुर्सत मिले तो...
अपनी औलादों को फोन कर मेरा हाल चाल पूँछ लेना..
तुम्हें ख़ुशी मिलेगी..
अपने दिए संस्कारों पर..."
"यदि -मेरे बेटे रुठ के तुमसे बोलें... की पिताजी को सब शिकायते हमसे ही हैं...
सर पर हाथ फेर के कह देना की -पिताजी को सब उम्मीदे भी तो तुम से ही है..."
सच.. अब क्या कहूँ!
बस.. इतना समझ लेना की -
"बारिश के बाद तार पर टंगी आख़री बूंद से पूछना,
क्या होता है अकेलापन..."
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