तीस बाई चालीस के प्लाट जैसी हो गई है ज़िन्दगी !
जो मकान मेरे कस्बे में बीघा या एकड़ में होता था …
जो स्विमिंग पूल गाँव में -तालाब सा होता था …
जो बगीचा गाँव में -जंगल सा होता था ....
और
जो ड्राईंग रूम गाँव में -नीम के पेड़ तले -चौपाल सा होता था …
अब
सब बिछड़ कर और भटक कर -
'तीस बाई चालीस ' में सिमट गया है।
जो 'बचपन की मोहब्बत'' …
'आम अमरुद' के पेड़ों तले पनपती थी …
अब पसार रही है अपने पैर …
'पित्ज़ा हट' में या 'मैकडोनाल्ड्स' में।
तीस बाई चालीस में।
प्रेमपत्रों ने भी खो दिया है अपना वजूद …
और ' व्हाट्स एप्प ' या ' मैसेज ' से घिसठ रही है -ज़िन्दगी।
तीस बाई चालीस में।
जो प्यार और दुलार … पलकों की छाओं …
नाना नानी का दुलार और दादा दादी की फुहार …
मिलती थी ननिहाल और ससुराल में …
गुमशुदा हो गई है -शहर की भीड़ और 'क्रैश' में।
तीस बाई चालीस में।
अब ' सदा सुहागिनों रहो ' के सिन्दूर ने भी -'अपना लिया है -' शोर्टकट ' और
पूरी मांग में भरे सिन्दूर ने …
सिमट कर ले ली है -छोटी सी जगह -
बिंदी से थोड़े ऊपर।
तीस बाई चालीस में !
जो बेटे पड़ते थे पैर -अपने माता पिता के -सिर रख कर चरणों में …
अब पड़ने लगे है पैर -घुटनों से …
तीस बाई चालीस में।
पापा जी! आप नाना बनने वाले है …
बाबूजी! आप दादा जी बनने वाले हैं …
और
सुनो! -आप पापा बनने वाले है …
जैसी -" शर्म ओ हया " की बातें …
खो गई है … बहुत दूर …
किसी पिछड़े गाँव की -'अम्मा वाली अटारी' में …
तीस बाई चालीस में।
अब माँ पापा की समाधी पे -
दीवाली पर ;
दिए रखने में भी दिक्कत होने लगी है …
और
दिवाली की रात …
अक्सर ' खुद का अक्स ' बातें करता है की -
' माँ -पापा ' की समाधी पे जाना … जरूरी है …
या
धन की देवी -लक्ष्मी की पूजा ?
क्यों लगता है … कि -
शायद मेरी पीढ़ी …
आखिरी पीढ़ी है -
जो -माता -पिता का सम्मान कर रही है …
और
शायद अगली पीढ़ी ,,,,
करेगी माँ -पापा से प्यार …
बिलकुल वैसे -
जैसे हम करते हैं ....
अपने ' एंड्राइड मोबाइल 'से अटूट प्यार ।
सच 'तीस बाई चालीस ' के प्लाट जैसी
हो गई है ज़िन्दगी की पतंग ....
और उसका -मांझा।
(गर्वित गौरव !)
जो मकान मेरे कस्बे में बीघा या एकड़ में होता था …
जो स्विमिंग पूल गाँव में -तालाब सा होता था …
जो बगीचा गाँव में -जंगल सा होता था ....
और
जो ड्राईंग रूम गाँव में -नीम के पेड़ तले -चौपाल सा होता था …
अब
सब बिछड़ कर और भटक कर -
'तीस बाई चालीस ' में सिमट गया है।
जो 'बचपन की मोहब्बत'' …
'आम अमरुद' के पेड़ों तले पनपती थी …
अब पसार रही है अपने पैर …
'पित्ज़ा हट' में या 'मैकडोनाल्ड्स' में।
तीस बाई चालीस में।
प्रेमपत्रों ने भी खो दिया है अपना वजूद …
और ' व्हाट्स एप्प ' या ' मैसेज ' से घिसठ रही है -ज़िन्दगी।
तीस बाई चालीस में।
जो प्यार और दुलार … पलकों की छाओं …
नाना नानी का दुलार और दादा दादी की फुहार …
मिलती थी ननिहाल और ससुराल में …
गुमशुदा हो गई है -शहर की भीड़ और 'क्रैश' में।
तीस बाई चालीस में।
अब ' सदा सुहागिनों रहो ' के सिन्दूर ने भी -'अपना लिया है -' शोर्टकट ' और
पूरी मांग में भरे सिन्दूर ने …
सिमट कर ले ली है -छोटी सी जगह -
बिंदी से थोड़े ऊपर।
तीस बाई चालीस में !
जो बेटे पड़ते थे पैर -अपने माता पिता के -सिर रख कर चरणों में …
अब पड़ने लगे है पैर -घुटनों से …
तीस बाई चालीस में।
पापा जी! आप नाना बनने वाले है …
बाबूजी! आप दादा जी बनने वाले हैं …
और
सुनो! -आप पापा बनने वाले है …
जैसी -" शर्म ओ हया " की बातें …
खो गई है … बहुत दूर …
किसी पिछड़े गाँव की -'अम्मा वाली अटारी' में …
तीस बाई चालीस में।
अब माँ पापा की समाधी पे -
दीवाली पर ;
दिए रखने में भी दिक्कत होने लगी है …
और
दिवाली की रात …
अक्सर ' खुद का अक्स ' बातें करता है की -
' माँ -पापा ' की समाधी पे जाना … जरूरी है …
या
धन की देवी -लक्ष्मी की पूजा ?
क्यों लगता है … कि -
शायद मेरी पीढ़ी …
आखिरी पीढ़ी है -
जो -माता -पिता का सम्मान कर रही है …
और
शायद अगली पीढ़ी ,,,,
करेगी माँ -पापा से प्यार …
बिलकुल वैसे -
जैसे हम करते हैं ....
अपने ' एंड्राइड मोबाइल 'से अटूट प्यार ।
सच 'तीस बाई चालीस ' के प्लाट जैसी
हो गई है ज़िन्दगी की पतंग ....
और उसका -मांझा।
(गर्वित गौरव !)

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