Monday, August 3, 2015

तीस बाई चालीस के प्लाट जैसी हो गई है ज़िन्दगी !

तीस बाई चालीस के प्लाट जैसी  हो गई है ज़िन्दगी !

जो मकान मेरे कस्बे में बीघा या एकड़ में होता था  …
जो स्विमिंग पूल गाँव में -तालाब सा होता था  …
जो बगीचा गाँव में -जंगल सा होता था  ....
और
जो ड्राईंग रूम गाँव में -नीम के पेड़ तले -चौपाल सा होता था  …
अब
सब बिछड़ कर और भटक कर -
'तीस बाई चालीस ' में सिमट गया है।

जो 'बचपन की मोहब्बत''  …
'आम अमरुद' के पेड़ों तले पनपती थी  …
अब पसार रही है अपने पैर  …
'पित्ज़ा हट' में या 'मैकडोनाल्ड्स' में।
तीस बाई चालीस में।

प्रेमपत्रों ने भी खो दिया है अपना वजूद  …
और ' व्हाट्स एप्प ' या ' मैसेज ' से घिसठ रही है -ज़िन्दगी।
तीस बाई चालीस में।

जो प्यार और दुलार  … पलकों की छाओं  …
नाना नानी का दुलार और दादा दादी की फुहार  …
मिलती थी ननिहाल और ससुराल में  …
गुमशुदा हो गई है -शहर की भीड़ और 'क्रैश' में।
तीस बाई चालीस में।

अब ' सदा सुहागिनों रहो ' के सिन्दूर ने भी -'अपना लिया है -' शोर्टकट ' और
पूरी मांग में भरे सिन्दूर ने   …
सिमट कर ले ली है -छोटी सी जगह -
बिंदी से थोड़े ऊपर।
तीस बाई चालीस में !

जो बेटे पड़ते थे पैर -अपने माता पिता के -सिर रख कर चरणों में  …
अब पड़ने लगे है पैर -घुटनों से  …
तीस बाई चालीस में।

पापा जी! आप नाना बनने वाले है  …
बाबूजी! आप दादा जी बनने वाले हैं  …
और
सुनो! -आप पापा बनने वाले है  …
जैसी -" शर्म ओ हया " की बातें  …
खो गई है  … बहुत दूर  …
किसी पिछड़े गाँव की -'अम्मा वाली अटारी' में  …
तीस बाई चालीस में।

अब माँ पापा की समाधी पे -
दीवाली पर ;
दिए रखने में भी दिक्कत होने लगी है  …
और
दिवाली की रात  …
अक्सर ' खुद का अक्स ' बातें करता है की -
' माँ -पापा ' की समाधी पे जाना  … जरूरी है  …
या
धन की देवी -लक्ष्मी की पूजा ?

क्यों लगता है  … कि -
शायद मेरी पीढ़ी  …
आखिरी पीढ़ी है -
जो -माता -पिता का सम्मान कर रही है  …
और
शायद अगली पीढ़ी ,,,,
करेगी माँ -पापा से प्यार  …
बिलकुल वैसे -
जैसे हम करते हैं  ....
अपने ' एंड्राइड मोबाइल  'से अटूट प्यार ।

सच  'तीस बाई चालीस ' के प्लाट जैसी
हो गई है ज़िन्दगी  की पतंग ....
और उसका -मांझा।

(गर्वित गौरव !)


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