Saturday, September 12, 2015

बिहार और विहार … (यात्रा बुद्धतत्व की !)

"इक पकी हुई सफ़ेद दाढ़ी वाले से... 
कितना परेशान है -महा+गठ+बंधन...

कितने ख़ौफ़ज़दा हैं यह दोनों.. इक 'अदने' से चाय वाले से!

ऐसा लगता है की कहीं चाय की दूकान -
पूर्वी भारत में भी न खुल जाए..
.
वो आज भी सिपहसालार हैं;
मगर 'डर' उनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है!
ऐसा लगता है की चमकती आँखों में -मोतियाबिंद उत्तर आया है....

वहीँ -
लगभग 'रिटायर' हो चुके -पुराने मुखिया तो  .... 
दहशत में रिश्तेदारों -को याद दिलाने में जुट गए हैं कि -
वो उनके खासमखास  हैं। 

अरे कभी कभी अपने अंदर भी झाँकने की दम किया करो !

समाजवाद के रहस्यवाद को समझने के  … 
मंथन वाले शिखर वक़्त में  …
जब -जय प्रकाश नारायण  की क्लास में;
सबसे पीछे वाली बैंचों में बैठ कर 
तुम लोग 'मटरगश्ती' किया करते थे  … 
उस वक़्त यह छात्र  … 
संघ की  कक्षाओं में  … 
स्वावलम्बन का '-क ख ग ' समझ रहा था और 
किसी कमरे में 
अपनी विचारों की नीँव को -
मजबूती प्रदान कर रहा था। 

कभी कभी  .... 
डर लगता है कि -
तुम लोगों के साथ -
भारत में ;
समाजवाद की पीढ़ी, 
समाप्त न हो जाये। 
और 
तुम लोगों को भी -
आखिरी ध्वज वाहकों 
के रूप में -
याद किया जाये। 

अँधेरा सब जगह आता है  … 
दुनियां का कोई कौना नहीं है ,जहाँ -
गलत लोग चुन कर न आये हों।  
परन्तु ;
 कठोर सच यही है की -
नेपोलियन से हिटलर तक हों या 
तुगलकों से लेकर औरंगज़ेबों तक  … 
अंत या पतन सभी का हुआ। 

फिर 'हम और तुम' तो 
किस खेत की अमर मूली हैं ?

अरे बात सड़कों की करो ,शिक्षा की करो ,रोजगार की करो  … 
सपनों की करो ,पर्यटन की करो या 
अपराध ख़त्म करने की करो। 
और तुम बात  … 
धर्म की करते हो , निरपेक्षता की करते हो या  न जाने कौन से वहमों की करते हो 
जिनसे 
जनता को कोई 
लेने देना नहीं है। 

अरे !तुम लोग तो गौतम बुद्धा के सरजमीं के हो  .... 
जिसने शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाया ;सारे विश्व को ?
तो फिर -
तुम लोग क्यों नहीं  … 
दान कर देते हो  
अपनी सारी जमीन जायदाद ;
जन कल्याण में -
धर्म निरपेक्षता के बड़े मंदिर के निर्माण हेतु ?

अरे कुछ ठोस यथार्थ के धरातल पर करना पड़ेगा !
तभी दाल गलेगी अन्यथा  .... 
अधपके कच्चे चावलों से ही ,
'लोकसभा' जैसा काम ;
चलाना पड़ेगा। 

काश !
आप महानुभाव समझ सकते -
आम जनमानस का क्रंदन,वंदन और निवेदन 
कि -
अब आप लोगों का ;
बुद्धतत्व के- 'विहारों ' की और प्रस्थान करने का वक़्त हो चला है ;
राजनैतिक बारिश चलायमान है और 
अब 
राजनैतिक वानप्रस्थ ;
आपका इंतज़ार कर रहा है। "

 गर्वित गौरव!




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