Tuesday, September 15, 2015

इस वर्ष समूचे बुंदेलखंड में पानी न बरसने का प्रमुख कारण -ग्रेनाइट!

 "चलो दिल्ली... अपने-
   'नमो' को दुखड़ा सुनाएंगे इन पत्थरों से निकलते आंसूं दिखाएंगे! "

[नीचे दिया गया आलेख पूर्णतः व्यक्तिगत विचार हैं ; जिनका उद्देश्य परम आदरणीय मीडिया और  जागरूक युवाओं को  ज्ञात करवाना है की -उनसे ... उनकी सरजमीं कुछ मांगती है और वे चैतन्य अवस्था में रहें... बहुत कुछ अच्छा और बुरा हो रहा है ;यहाँ -लवकुशनगर में ; जिसका खामयाजा आगे आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी!]

 आलेख /विचार                                            
 (नहीं किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप!) 

लवकुशनगर के आसपास कुछ खनन कंपनियां पैदा हो गई हैं जो चंद सालों में ही करोड़ों के टर्नओवर पर पहुँच गईं हैं!
इस क्षेत्र में ग्रेनाइट कारोबार जबरदस्त तरीके से फलफूल रहा है और हम मूल वासी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं!
इन कंपनियों ने कौन से जनहित के कार्य स्वयं करवाये? यह जांच का विषय है?

सिर्फ एक विषय -"वृक्षारोपण" पर  चर्चा हो जाये तो इन सम्मानीय ग्रेनाइट मालिकों को साबित करना पड़ेगा की कटहरा और आसपास में जितनी जल जंगल और जमीन उपयोग की गई है... क्या हकीकत में
इन्होने -वृक्षारोपण कर और पूरे पेड़ उगा कर- अपना राज्य शासन और नियमों के तहत किये गए  वादे या कर्तव्य  निभाया है?

सनद रहे की -लवकुशनगर के आसपास इस वर्ष पानी न बरसने का प्रमुख कारण -ग्रेनाइट
उद्योग द्वारा हो रहा जल  जंगल और जमीन के साथ तय शुदा मापदंडों से ऊपर  जा कर प्रकृति के  साथ खिलवाड़/दोहन भी है!
कटहरा से लवकुशनगर तक की सड़क तोड़ें यह और बनवाएं राज्य शासन और कष्ट भुगते आम जनमानस- क्यों?
क्या नवीन सी-सी रोड  जो लवकुशनगर में करोड़ों की लागत से बना है ;उसमें इन बीस चक्का  लोडेड ठेलों के चलने /निकलने की पात्रता है?
क्या जो रॉयल्टी यह शासन को देते हैं ; क्या उसमें-
हमारी सड़क तोड़ने का टैक्स, 
गाँव में धुल उड़ाने का टैक्स, 
ट्रैफिक जाम करने का टैक्स और
गौऊ माता कुचलने का टैक्स समाहित है?

बहुत हो गया भर्रा ;अब जागो  लवकुशनगर के सीधे-सादे भोले भाले रहवासी!
जब निकटवर्ती रेलवे स्टेशन डुमरा है ; तो कटहरा और अन्य खदानों का माल /पत्थर डुमरा से
क्यों न जाये और लवकुशनगर से ठेले क्यों गुजरें?
कटहरा से निकटवर्ती रेलवे स्टेशन अथवा गुजरात पोर्ट ले जाने हेतु लवकुशनगर की बीच बस्ती से यह बीस चक्का वायुदूत ठेले -बेख़ौफ़ धड़ल्ले से निकलते हैं! क्यों? और कैसे?
क्या हमारी नगर पंचायत इन "बड़े भगवानों" पर कोई -लवकुशनगर की सडकों से गुजरने का टैक्स लगाने का प्रस्ताव नहीं ला  सकती ;जिससे कसबे का भी भला हो और इस सडकतोड़ व्यापार पर कुछ तो लगाम लगे!
मित्रो! यह कंपनी वाले इतने निष्ठुर हैं की -हम गरीबों के लिए ३० टन पास सड़क पर यह ७० टन के ठेले दिन हो या रात... निकालते हैं और एक नहीं.... तीन और चार वो भी एक साथ! फिर चाहे जननी हो या एम्बुलेंस.... इन्हें कोई मतलब नहीं... रोड पर डिलवरी करवाओ या मरो.... कोई मतलब नहीं!

जागो  सम्मानीय भाइयो बहनो... जागो!
चलो शिकायत करें माननीय कलेकटर महोदय से और दुखड़ा रोएँ उनसे जो हमारे जनप्रतिनिधि है!

"लपट उठी है -मोदी की!
"न खाऊंगा और न खाने दूंगा! "
आओ अमल करें माननीय प्रधानमंत्री जी के सद्वाक्य पर!
और 
बदलें लवकुशनगर की सोच को!
[दिल आहत हो तो माफ़ करें... 
दिल उद्देलित हो तो -जुट जाएँ कुछ अनूठा इस धरती के लिए करने को... जिससे जब कभी हम अकेले में -अपनेआप से बात करें -मन वचन कर्म से -तो नाज़ हो हमें -अपने आप से! ]

धन्यवाद! 
 (bundelidhamaka.blogspot.in)

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