Wednesday, September 7, 2011

Lost Moments!

"ज़िन्दगी की  फिसलती रेत पर -
जब चलते चलते-
थक जाते है पैर-
चिपक जाते है बालू के कुछ कण,
साथ में कुछ काटें भी देते है दस्तक, 
तब जीवन साथी के साथ- 
लगता है कहीं बैठ कर, 
सुकून से सुस्ता कर-
पलटें अपने  जीवन के उप्पनयास  को !

दस्तक आती है-
उन पथरीले रेगिस्तानो से-
जिसके धूल भरे अंधड़,
इस तूफ़ान मे,
पार नहीं कर सका मै!

आहट आती है-
उन अधूरी उमंगो की, 
जो पूरी नहीं हो पाई 
प्रयास के बावजूद !

याद आते है वे माँ पापा-
जिनके लिए मै शानू से शनोली था;
बेटा होते हुए भी बेटी था;
आख़ों का स्वप्न था;
स्वप्नों की हकीकत था;
बुढ़ापे की लाठी था!

याद आते हैं वे दोस्त -
जिनके साथ मैने-
दोड़ना, कूदना, हँसना, मस्ती, करना सीखा!
प्यार, वफ़ा, ज़िन्दगी, भरोसा, अफसाना, जैसे शब्दों के माइने सीखे !
और रिश्तों की परिभाषा सीखी !

और अब जब आख़ों मे झुर्रियन पड़ने लगी हैं,
बाल सफ़ेद होने लगे हैं,
गालों पे गड्डे पड़ने लगें हैं,
याद आते हैं-
फिर वो सिमटे बिछड़े हुए पल-छिन-
जो हमने माँ-पापा भाई-बहिन के साथ गुजारे थे, 
दोस्तों के साथ ख्वाब देखते हुए गुजारे थे, 
जीवन साथी के साथ भविष्य के ताने-बाने बुनते हुए बिताये थे,
और बच्चों के साथ ऊँच-नीच समझाते हुए गुजारे थे !

आओ उन स्वर्णिम पलों के लीये ,
उस ऊपर वाले को धन्यवाद दें-
जिसकी कृपा से 
यह ज़िन्दगी गुज़री !
आओ -
जो अधूरा है, उसे पूरा करैं ;
सपनों को हकीकत बनाएँ ;
नवीन परिभाषाएँ लिखें 
और जीवन सत्य के
चरम पे पहुचें !!"






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