जब चलते चलते-
थक जाते है पैर-
चिपक जाते है बालू के कुछ कण,
साथ में कुछ काटें भी देते है दस्तक,
तब जीवन साथी के साथ-
लगता है कहीं बैठ कर,
सुकून से सुस्ता कर-
पलटें अपने जीवन के उप्पनयास को !
दस्तक आती है-
उन पथरीले रेगिस्तानो से-
जिसके धूल भरे अंधड़,
इस तूफ़ान मे,
आहट आती है-
जिसके धूल भरे अंधड़,
इस तूफ़ान मे,
पार नहीं कर सका मै!
आहट आती है-
उन अधूरी उमंगो की,
जो पूरी नहीं हो पाई
प्रयास के बावजूद !
याद आते है वे माँ पापा-
जिनके लिए मै शानू से शनोली था;
बेटा होते हुए भी बेटी था;
आख़ों का स्वप्न था;
स्वप्नों की हकीकत था;
बुढ़ापे की लाठी था!
याद आते हैं वे दोस्त -
जिनके साथ मैने-
दोड़ना, कूदना, हँसना, मस्ती, करना सीखा!
याद आते है वे माँ पापा-
जिनके लिए मै शानू से शनोली था;
बेटा होते हुए भी बेटी था;
आख़ों का स्वप्न था;
स्वप्नों की हकीकत था;
बुढ़ापे की लाठी था!
याद आते हैं वे दोस्त -
जिनके साथ मैने-
दोड़ना, कूदना, हँसना, मस्ती, करना सीखा!
प्यार, वफ़ा, ज़िन्दगी, भरोसा, अफसाना, जैसे शब्दों के माइने सीखे !
और रिश्तों की परिभाषा सीखी !
और अब जब आख़ों मे झुर्रियन पड़ने लगी हैं,
बाल सफ़ेद होने लगे हैं,
गालों पे गड्डे पड़ने लगें हैं,
याद आते हैं-
फिर वो सिमटे बिछड़े हुए पल-छिन-
जो हमने माँ-पापा भाई-बहिन के साथ गुजारे थे,
दोस्तों के साथ ख्वाब देखते हुए गुजारे थे,
जीवन साथी के साथ भविष्य के ताने-बाने बुनते हुए बिताये थे,
और बच्चों के साथ ऊँच-नीच समझाते हुए गुजारे थे !
आओ उन स्वर्णिम पलों के लीये ,
उस ऊपर वाले को धन्यवाद दें-
जिसकी कृपा से
यह ज़िन्दगी गुज़री !
आओ -
जो अधूरा है, उसे पूरा करैं ;
सपनों को हकीकत बनाएँ ;
नवीन परिभाषाएँ लिखें
और जीवन सत्य के
चरम पे पहुचें !!"
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