बचपन...
कभी जाता नहीं...
ज़िंदा रहता है -दिल के किसी कौने कतरे में... अपनी मासूमियत को तलाशता हुआ...
बचपन...
बरबस याद दिल देता है -
रेत के घरोंदे.... जो
असल ज़िन्दगी में सीमेंट और कंक्रीट तक का सफर तय कर दिलों को रेत के महलों सा ढेर कर देता है...
बचपन....
पंख लगाता है -
ऊंची उड़ान का....
सुनहरे ख़्वाबों का.... और
बिना डरे कुछ कर गुजरने की उम्मीद का....
बचपन....
याद दिलाता है -
प्यारी माँ के प्यार को....
पूज्य पापा की फटकार को....
बहिन की मनुहार को...
दादा-दादी की स्नेह फुहार को... और
दोस्तों की ललकार को....
बचपन....
भीनी भीनी खुशबू देता है -
संस्कारों की...
अनुशासन की...
जज़्बातों की.... और
सपनों की उड़ान की....
बचपन...
फिर लौट के आजा -
वो क्लासरूम में कॉपी के पेज फाड़ कर राकेट बना कर उड़ाना...
वो होली में किसी को रंग और कीचड़ से भिड़ाना...
वो पेट दर्द और स्कूल न जाने का बहाना...
ओह मेरे बचपन...
हमेशा याद आना! "
(शानू!)
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