Friday, April 11, 2014

गुज़र और बसर

गुज़र  और बसर!

तुम अपनी राह पे हो और हम अपनी राह पे !  

तुम अपनी बसर कर रही हो और
हम अपनी गुज़र कर रहे हैं!

हमने अपनी ज़िन्दगी तुम्हें नज़र कर दी और
तुमने अपनी रुस्वाइयां हमें सितम कर दी!

इतना सब हो जाने के बाद भी...
भूले नहीं हैं हम दोनों वे मोहब्बत के रीति रिवाज जो इक दूसरे को हम दोनों ने पढ़ाये थे!

शयद अलविदा कहने की आदत अभी तुम्हारी
गई नहीं?
कितने धीरे से मुझे भी तो अलविदा कह कर
यही कहा था न -"मुझे भूल जाना! "

तभी तो कारवां गुजरने के बाद का गुबार देखने हर साल होली पे पीहर आती हो और -
फिर उस छत की मुंडेर पे जाती हो जहाँ से मेरे सपनों  का खंडहर दीखता है?

हर शाम अब भी डूबते सूरज को निहारती हो?
फलक से ओझल होते पंछिओं को देखती हो?
बदली नहीं हो न बिलकुल?
न बदलोगी
कभी!
क्यों की मोहब्बत मेरी थी!

इतने साल बाद इतना ही कहूँगा की -

"खंडहर में कुछ दिए हैं
टूटे हुए से....
उन्हीं से काम चलाओ प्रिय,
बहुत उदास है -रात! "

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