इक शहीद की विधवा की
अपने पति को पाती :
तुम कारगिल युद्ध में शहीद होकर...
बहुत दूर...
क्षितिज पे चमकते तारों की तरह...
आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए -विचारों की तरह.... और...
मेरी तुम्हारी सात फेरों से बंधी..
ज़िन्दगी....
इक लम्बी जिरह!
मेरे बिछड़े साथी!
घटाटोप अँधेरी रात में -परमवीर चक्र के साथ तुम चस्पा हो ...
"ड्रॉयिंग रूम" में अकेले करीने से
और -
मैं यहाँ अकेली...
निर्जन काली रात में -
बड़ा करती.. तुम्हारे बच्चों को..
तुम्हारे सपनों को!
तुम्हारी कसम...
अकेले में -
रोती,सुबकती, कराहती हूँ और
दुनिया के सामने -
शाल ओढ़े...
हाथ में -तुम्हारा मेडल और प्रशस्ति पत्र लिए...
अपने पोरों के आसुओं को छुपाते...
भारी मन से -बैठी रहती हूँ -कुर्सी पे...
तुम्हारी वसीयत बनकर!
तुम्हारी ज़िन्दगी!
(गर्वित गौरव!)
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