Monday, June 15, 2015

बारिश में दिलों की खलिश!

बारिश में दिलों की खलिश!

"बारिश में अब नहीं जाती लाइट...अब नहीं होती वो
बचपन की बारिश... जब
तीन तीन दिन तक बाढ़  में बस नहीं आती थी..

अब नहीं कोई घूमता  - अँधेरे में ; माचिस ढूढ़ने की फ़िक्र में.. मोमबत्ती जलाने को... और तेज़ आंधी में उड़े उसकी चुनरिया और वो बेफिक्री
से संभाले अपनी उमरिया..

अब नहीं कोई टकराता या डर कर गले लगता.. अँधेरे में... बादल गरजने पर...

अब नहीं कोई नहाता छत पर अपनी जुल्फें बिखेर कर.. आँखें मींच कर.. चुनरी भिगो कर.. बारिश में... खुले आकाश में.. और हम निहारा करते थे दिल मसोस कर....

अब तो बारिश भी उस बेफिक्री से नहीं होती.. जब हम हाफ पैंट में कूद जाते थे सड़क के बहते बरसाती पानी में...

अब तो कोई बारिश में घर के बरामदे में सर छुपाने को भी नहीं आता... जिसे माँ बोलती... बेटी भीग जाओगी... अंदर आ जाओ...

अब तो बादलों ने भी गड़गड़ाने की आदत छोड़ दी है... जिसकी आवाज़ से हम सिमट जाते थे.. प्यारी माँ /पापा के गले से....

लगता है.. आँखों से बरसता पानी हरा देगा बारिश के पानी को.. तोड़
डालेगा भावनाओं और जज्बातों के सारे बांधों  और तूफानों को...

सच ज़िन्दगी की उठापटक में... बहुत पीछे छूट गई है.. बारिश की फुहार...
मिटटी की सोंधी खुशबू..
पंछिओं का हड़बड़ाहट में अपने घोंसले की और लौटना.. चूजों की चिंता में..
जैसे पापा आते थे ऑफिस से भीगते हुए.. जल्दी में.. की शानू स्कूल से आया?
सच बदलते वक़्त में बदल लिया है प्रकृति ने अपना -मिजाज...
यही ज़िन्दगी है..
यही फलसफा है...
यही बालों का सफ़ेद होना है...
यही हकीकत है और फ़साना है! "
मज़ा बारिश का चाहो..
तो मेरी आँखों में आ जाओ..
क्यों की..
वो (बादल!) बरसों में कभी बरसे... और
यह (आँखें!)..
बरसो से बरसती हैं!
(गौरव!)

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