तेरे बिना भी -
बदस्तूर....
चलती जा रही है -ज़िन्दगी की रेलगाड़ी... अपनी नियत पटरियों पर - छुक छुक करते हुए...
अपनी मंजिलों की ओर!
कल तक तुझे
चाँद के पार ले चलने का दम्भ भरने वाले बाजू..
आज अपनी पकी हुई सफ़ेद दाढ़ी पर -
खिजाब लगाने में
मशरूफ हैं!
वक़्त की मार ने... बड़े
होते बच्चों के साथ..... बदल दिए हैं -
मोहब्बत के मुहावरे!
तेरे दिल की गलियों की जगह ले ली है -
कोटा... IIT और PMT ने... जहाँ
इतिहास को दोहराते हुए मुझे फिर वही अपने बच्चों से कहना पड़ रहा है...
जो कभी मेरे पिता ने मुझसे कहा था की -
"मन लगाकर पढाई करना! "
चलो कोई बात नहीं...
तुम्हें तुम्हारी ज़िन्दगी मुबारक...
और मुझे मेरी!
कभी मिले तो...
तुम आंटी बन नमस्ते जरूर करना और
मैं अंकल बन -नमस्कार!
शुभ रात्रि!
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