बुढ़ापा -यात्रा शुन्य की ओर ………
तुम्हारा जाना …।
ऐसा लगा जैसे -
बूढ़े वृक्ष का -
गिर जाना।
सत्तर साल की उमर में -
बूढा ही तो कहूँगा ;अपने आप को
अधेड़ थोड़ी?
जब पचास साल तक-
हम दोनों साथ साथ चले ................
तो फिर-
एक दम से-
चक्की के दो पाटों को-
अलग कर दिया जाना;
वो भी ऊपर वाले के द्वारा …
अबूझ पहेली ही है!

जब तुम गईं तो लगा की-
चलो यह प्रकृति का अटल सिद्धांत है और;
जो थोड़ी बहुत ज़िन्दगी-
बच गई है वह;
तुम्हारे बच्चों के साथ कट जाएगी।
शुरुआत में तो …
तुम्हारे बच्चों ने
तुम्हारे जाने का इतना दुःख मनाया कि ऐसा लगा कि जैसे-
जितना ये बच्चे तुम्हें प्यार करते है और तुम्हारे जाने का दर्द है;
वैसा तो शायद मुझे भी नहीं है.
और-
अब शायद …………
तुम्हारे हिस्से का प्यार ,आदर और सम्मान-
मुझे देंगे और अपने वृद्ध पिता का;
ख्याल रखेंगे।
तुम बहुत दूर हो पर इतना जान लो कि -
तुम्हारे नहीं बल्कि हमारे बच्चे;
बहुत होनहार निकले।
और ……
यही सोचता रहता हूँ कि-
यह किसपे गए हैं ?
न तुम ऐसी थीं ……
न मैं ऐसा हूँ …
तुम इतनी दूर हो कि -
मैं अब तुम्हें बहुत दुखी नहीं करना चाहता।
बस इतना समझ लो-
'मन' अच्छा नहीं है;
और
अब शरीर साथ नहीं देता है ...................
देखते हैं -
कब तक चलता है।
साइकिल चलाने में दिक्कत जाती है ;घुटने साथ नहीं देते।
चड्डी बनियान धोने में दिक्कत जाती है ;बस खंगार लेता हूँ।
पीठ मे खुजली होती है तो कंघे से काम चलाता हूँ ;
और …
बाथरूम में बाल्टी में पानी भरना अब बस की बात नहीं रही।
और एक बात …
रात को जब चाय पीने का मन करता है तो सच्ची आंसू पीना पड़ते हैं क्यों कि -
सबसे पहले तुम चलीं गईं।
फिर बेटियां पराई हो गईं।
फिर बहुओं के आने से -
वो तुम्हारे 'होनहार' भी पराये हो गए और अब तो शायद;
ऊंचा सुनने और देखने लगे हैं।
जिस कारण अब उन्हें -
मेरा 'दर्द' दिखाई नहीं देता और 'आवाज़' सुनाई नहीं देती।
सच्ची तुम्हारी कसम …
कभी कभी तो उन्हें मेरी भूंख भी नहीं दिखाई देती।
कभी यह मत सोचना कि -
मैं तुम्हारे बेटों की सेवा से स्वस्थ्य या सुखी हूँ बल्कि -
मैं अपनी पेंशन से सुखी हूँ और ज़िंदा हूँ वरना अभी तक शायद
किसी वृद्ध आश्रम में
दिन काट रहा होता।
जब मेरे बेटे मेरे न हुए तो फिर तुम ही बताओ
किसी पराये घर से आयी हुई सुन्दर सुशील बहुऐं कैसे
मुझे 'पापाजी 'बोलने लगेंगी और अपना पिता तुल्य मानने लगेंगी ?
अब तो यह हाल है कि -
अगर कभी कुछ मन का खाने का मन करता है तो
तुम्हारा स्थान लेने को आतुर यह बहुऐं
कहती हैं की -
पापाजी !यह न खाएं ;आपको नुकसान करेगा और फिर भैया ने
मन भी किया है।
कितना चाहतीं हैं न मुझको ?है न ?
खैर तुम चिंता मत करना ;फिर बोल रहा हूँ क्यों की -
मेरा जज्बा अभी ज़िंदा है।
मेरी पेंशन अभी ज़िंदा है और मेरे -
ईश्वर अभी ज़िंदा हैं और -
मेरे साथ हैं।
हमेशा की तरह इन बच्चों को आशीर्वाद ही दूंगा क्यों कि -
यह सारे -हमारे सपने हैं ,हमारे बच्चे हैं और हमारे अपने हैं।
सदा खुश रहें।
सदा सुखी रहें।
सदा ईश्वर इनकी सहायता करे और
गलतियों को माफ़ करे।
अब क्या लिखूं ?
तुमसे बात कर के सच -
जी हल्का हो गया।
आज ऐसा लगा जैसे -
तुम्हारे हाँथ के उर्दा की दाल के बड़े खा लिए हों ,
तुम्हारे हाँथ के चीले खा लिए हों और
तुम्हारे द्वारा पीसी टमाटर की चटनी खाई हो।
अब क्या लिखूं ?
आँखें डबडबाई हैं।
ज़ुबाँ थरथराई है।
आवाज़ लड़खड़ाई है और
यादें फिर आँखों पे -
उतर आयीं हैं।
जहाँ कहीं भी रहो -
खुश रहो।
सदा खुश रहो।
मेरी चिंता मत करना।

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