उन चरणों को प्रणाम जिनका मैं बेटा हूँ!
एक बुजुर्ग पिता का दर्द अपनी
औलादों से जो समाज के ठेकेदार बन गए -
"खद्दर का कुरता पहन कर वो अपने हाथों में अगरबत्ती लिए अक्सर निकल जाता है;मेरे बगल से ;ईश्वर की खोज में....
बिना बोले और बिना बतियाए मुझसे!
काश तनिक ठहर कर दो घडी बतिया लेता मुझसे तो मैं भी बता देता उसको....
भगवान कैसे मिलेंगे! "
किसी ज़माने में जब वह वो छोटा बच्चा था ;मुझे बड़े प्यार और आदर से -पिताजी कहता था!
आज उम्र के इस पड़ाव पे शिथिल होने पर ढलती शाम में -
पहचान ही ले तो काफी है!
"ज़माने की फ़िक्र में वो आधे हुए जा रहे है,
तनिक अपने पिता के चरण पखार लेते तो समझ आ जाता की -
राम कहाँ बसते हैं! "
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