पतझड़,आंधी और तूफानों का तो ...
ता उम्र अहसास रहा ...
बसन्त और सावन का भान ..
तेरे मोहपाश से हुआ !
कुछ कुछ ..
नन्ही गौरैयों की मानिंद ...
तुम आ गईं ....
मेरे आँगन में चहचहाने और ..
जीवन यज्ञ की ....
सारी बगिया ...
चन्दन सी महक उठी ...
तेरे साथ !
मुझे कभी ....
गुलाब अच्छे नहीं लगे ...
क्योंकि ;
न मैं कभी गुलाब हुआ और ...
न कभी ज़िन्दगी गुलाबी !!
कल भी और आज भी ...
सिर्फ पलाश के फूल ही ...
तुम्हारे जैसे ...
मन को भाते रहे हैं !
कुछ कुछ ...
प्लाश सी ज़िन्दगी ...
बहुत सुकून देती है !
बसन्ती-बसन्ती ...
भीनी-भीनी ...
पेड़ से गिर कर ...
मिटटी में धीरे से ...
ठहरी ठहरी ...
उड़ती उड़ती और ...
दूसरों को सुख देती ...
प्लाश के फूलों जैसी पवित्र ..
सोंधी सोंधी ज़िन्दगी ...
तुम्हारे साथ होने का ..
अहसास कराती रहती है ;
पल पल !
इस वेलेंटाइन ;
ऐ मेरी प्लाश !
बस इतनी ही ...प्लाश सी ...
दो बातें ..तुम्हें समर्पित !!
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