Thursday, February 9, 2017

आह !सब कुछ गुज़र गया !



वो भी क्या रातें थीं ...

जब हम ;
अंधेरों से बतियाते थे !
चन्दा मामा के साथ साथ ..
चलते थे और ...
टूटते तारों से ...
तेरा संग और साथ मंगाते थे !
हां !
सब कुछ गुज़र गया ...
गुज़रे ज़माने की तरह !
जरा सा वक़्त ने ....
पहलू क्या बदला ;
जरा सी काया ने ....
उमर क्या दिखाई और
जुल्फों ने ....
सफेदी की रंगत क्या चढाई ..
सब कुछ ख़तम हो गया !
वो भी क्या दिन थे ...
जब तेरी याद में हम ...
रात रात भर नहीं सोते थे !
रातों में जागते थे और ...
दिन में फिर ...
तेरी यादों में खोते थे !
आह !
सब कुछ गुज़र गया !
पता ही नही चला ...
ज़िन्दगी ढोते ढोते !
तारे तो रोज़ निकलते होंगे ..
और चाँद भी रातों में ...
जम्हाई लेता ही होगा !
अब तो ...
बहुत बरसों से ....
तेरी कसम भी नहीं खाई है !
पर हाँ !!
इतना मालूम है कि -
समय के प्रवाह में ...
अब रातें मुझे घेरती नहीं हैं ..
और अँधेरे ....
मुझे सुलगाते नहीं हैं !
क्योंकि ...
अब "अपनी तपनी"
पिक्चर का "क्लाइमैक्स" ....
तो गुज़र चुका है और
तू अपने उजालों के साथ है ..
और मैं ;
अपने अंधेरों के तिलिस्म में ..
रौशनी तलाश रहा हूँ !
शब्बा खैर !

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