Thursday, February 9, 2017

सुबह की मॉर्निंग वाक और लवकुशनगर !

बहुत से युवा एवम बुजुर्ग आजकल बदलते समय के साथ मॉर्निंग वाक पर  ....
महोबा,चंदला एवम छतरपुर रोड पर निकलते हैं। उनका उद्देश्य जहाँ अपने स्वास्थ्य को तंदुरुस्त रखना होता है वहीँ प्राकृतिक सौन्दर्य का भी लाभ लेना होता है। 

अभी कुछ दिनों से कुछ श्रवणकुमारों ने बताया है कि वे अपने पिताजी की मॉर्निंग वाक से बहुत चिंतित रहते हैं। ये बुजुर्ग जो सुबह सुबह अपनी मॉर्निंग वाक पर निकलते हैं वे मॉर्निंग वाक से ज्यादा लवकुशनगर के बनते बिगड़ते नक़्शे पर ध्यान देते हैं। जिसका असर उनके बनते बिगड़ते स्वास्थ्य पर हो रहा है।एक दम से बीपी का बढ़ या घट जाना ,सीने में घबराहट होना या सांस फूलना और अत्याधिक गुस्सा आने के कारणों पर ध्यान देना बहुत जरूरी हो गया है।  
चलते चलते उन्हें पता हो जाता है कि किसने कितना अतिक्रमण किया और कौन करने वाला है !किसकी 'मयाड़' कहाँ से थी और अब कहाँ पहुँच गई है।आखिर लवकुशनगर के असली इतिहास के तो यही जानकार हैं चूँकि इन्होंने इस लौंडी को लवकुशनगर बनते भलीभांति देखा है। इनसे कुछ नहीं। इसी मॉर्निंग वाक में लाखों के जमीनों के सौदे भी हो जाते हैं। कुछ नेता टाइप के लोग तो मौका मुआयना भी कर लेते हैं और फिर काम आगे पीछे होते रहते हैं।  
चिंता कि  बात यह है कि -उम्र की संध्या की और गतिमान बुजुर्गों को कौन समझाए कि -"अब छोड़ो ये सब जी का जंजाल और मॉर्निंग वाक में -कमी झिन्नन के हनुमान जी या गायत्री माता के मंदिर में सुविचारों से अवगत हो और हमें करवाएं परंतु पूज्य पिताजी लोग मानते ही नहीं।
 फिर जब लौट कर आते हैं तो लवकुशनगर के  को लेकर झल्लाते हैं और कहते हैं कि -"इससे भली तो हमारे ज़माने की लौंडी थी जहां इतनीं उछल कूद नहीं थी और सभी प्रेम भाव से रहते थे। आज कल तो जहाँ देखो ज़मीनों की लड़ाई के अलावा कुछ नहीं है। "
खैर  .... ज़िन्दगी गतिमान है। आज ये अपने आदरणीय बुजुर्ग अपने वानप्रस्थ की और जा रहे हैं और कल हमारा भी नंबर आएगा। इसी को ज़िन्दगी कहते हैं।
नमन !

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