Saturday, February 25, 2017

पुर सुकून!

"बहुत सालों तक ..
वीरान रातों में ..
सताया है तूने ..
ऐ रातकली !

हमने भी अब ..
तेरी यादों की बेल पर ..
आंसुओं का पानी सींचना ..
छोड़ दिया है ...और ;
तेरी कसम ;
तेरे बिन ;
मुर्दा बन पड़ा रहता हूँ ..
पुर सुकून से !!"

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