"ढूंढते ढूंढते खुद को
मैं भटक गया हूँ ;
खुद से !
अब जब ..
उम्र का कारवाँ गुज़र गया ..
खाली पसीने से भरी ..
हथेलियों से रगड़ कर ..
उंगलियां ;
उकेरता हूँ ..
खोये हुए समय के वज़ूद को !
क्यों नहीं समझ पाया
उम्र,समय और उसके तिलिस्म को ?
और
चन्द सोहबतों के आगोश में
झोंक दी एक ज़िन्दगी !
और आज जब ..
देखा अपने अक्स को ..
बेटे के रूप में ; तो ..
नज़र आ गया मुझे ...
अपना वही अक्स और ..
लगा कि -
मैं न सही ....
मेरा बेटा सही ...
और
अब न भटकने दूंगा उसे ...
उन रास्तों से ..
जिन रास्तों से ...
कभी मैं गुज़रा था !!"
"समय जख्म कभी नहीं भरता बल्कि देता है ; सिर्फ घाव असफलता और बिछोह के !"
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