माली बेरोज़गार हो गए अब ...
गुलाबों को लेने ...
मोहब्बतें ...
बगीचों में तशरीफ़ नहीं लातीं !
"आर्चीज़" की गैलरी भी अब ...
फीकी फीकी रहती है !
"ग्रीटिंग्स से डेटिंगस" की तरफ ...
मुड़ कर जो चली गईं मोहबतें !
मन्दिरों में भी अब ..
वैभव लक्ष्मी /सन्तोषी माता व्रत ...
रखने वालीं ...
उड़तीं ,लहरातीं -तितलियाँ ..
कम ही आतीं हैं !
अब मोहबतों का ...
मन्दिरों में टँगे घंटों को बजा कर ...
मन्नतें मांगने का चलन ...
जाता रहा !
अब चिट्ठी पत्री लिख कर ..
इज़हारे मोहब्बतों को ...
जाहिर करने की अगन भी ..
समय के प्रवाह में ...
बुझती गई !
गद्दों,रज़ाइयों और तकियों के नीचे ....
अब नहीं पकड़ी जाती ...
एक दिल और उसमें तीर से निकलते ...
मोहब्बतों के फलसफे और ..
शेर ओ श्यारी वालीं चिठियाँ !
अब माँ पिता और भाई भावजें भी ...
ऐतराज़ नहीं करते ..
नए लड़को लड़कियों के ..
फितूरपने की मोहबत्तों को !
और अब ...
घर की इज़्ज़तों को भी ...
बट्टे नहीं लगते ...
बेसिर पैर की मोहब्बतों से !
समय का पहिया ...
चलता जा रहा है और ...
ये दिल और दर्द के रिश्ते ...
अपनी मोहब्बत का ...
सलीका बदलते जा रहे हैं !
"अब न वो रंग है ..
न वो संग है ...
न हुनर है और ...
अब न वह ...
सच्ची तरंग है !
बस यह कह लो ..
बेशर्मियों का लबादा ओढ़ ..
निकल पड़ीं है मोहबत्तें ...
अपनी ही बनाई ...
जुस्तुजुओं को मिटाने !"
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