Sunday, May 22, 2016

चालीस पार का मर्ज़!

चालीस पार का मर्ज़!

कुछ लोग ऐसे होते हैं....
जो बहुत पसंद आते हैं...
लेकिन न जाने क्यों....
वो ज़िन्दगी में....
कुछ देर से आते हैं...
और या यूँ कह लो की-
भगवान् भी उन्हें हमसे....
जरा कुछ देर से..
मिलाते हैं!

जब हम...
खामोशी से...
उनसे बिना पूंछे...
उन्हें ; पसंद...
करने लगते हैं तो...
लगता है -जैसे....
एक ताज़ा महकता हुआ कोई...
बसंती हवा का झोंका...
छू कर निकल गया हो ; यकायक!
और
जब वे हमसे दूर जाते हैं तो ऐसा महसूस होता है-जैसे...
किसी ने -
प्यार भरी चिट्ठी पढ़कर...
फाड़ दी हो ; यकायक!

उन्हें क्या पता की....
यूँ ही...
हमारी ज़िन्दगी में...
अनजाने में...
चहलकदमीं करते करते...
उनकी तस्वीरों के...
कितने पहलू...
हम नाप और भांप लेते  हैं....
दुखी सहमे मन से....
डरे डरे....
की कहीं...
किसी मोड़ पर.
कोई...
मन के भटकाव को.
पढ़ न ले ; यकायक!

हम जानते हैं....
की ये भटकाव है...
फिर -
क्यों दिल कहता है...
की यही ठहराव है???

असल में यह...
मानव मन और उसका लगाव है!
मन का सुसुप्त...
स्वभाव है!

हर टूटते तारे से........
एक ही ख्वाइश तो नहीं मांगी...
जा सकती न?
फिर...
जो साथ साथ..
कदम से कदम मिला कर....
चल रहा है...
उसमें क्यों ढूँढ़ते हो ...
सारी कायनात की खुशबुएं??

अरे धीरज रख मानव.....
दूर से...
अक्सर पहाड़ की हरी भरी वादियां... मन भावन दिखती हैं...
लेकिन जब...
उसपर चढ़ते हैं तो...
घुमाव दार घाटियां...
अक्सर...
मन को घबरातीं हैं!

इन इशारों को समझ...
न कर अचरज...
असल में ये है -
चालीस पार का मर्ज..
मत बन खुदगर्ज़..
घर के बच्चे और जीवनसाथी को....
देखने में क्या है -हर्ज़?

चल बिना भटके...
निभाएं अपना फ़र्ज़!!

No comments:

Post a Comment