Friday, May 20, 2016

शम्भू! मैं नहीं आ पाया उज्जैन...

शम्भू!
मैं नहीं आ पाया..  
उज्जैन...
नहीं था..
मन का चैन!
मैं था बेहद-
बेचैन!

इतनी गर्मी...
कि -तन बेहाल!
तपती धरती... 
और जेब फटेहाल!

ओह मेरे शंकर!
मैं न आ पाया..
उज्जैन!

न मैं नागा..
न मैं साधू..
न कोई अखाड़ा...
न कोई नगाड़ा...
यदि करता खर्च तेरे
दर्शन में...
तो बच्चे
हो जाते ट्यूशन में पीछे ;
एक पखवाड़ा!

मैं एक गरीब...
आदमी...
सोचा की..
जितने पैसे में -
उज्जैन में होगा तेरा दीदार...
उतने में खरीद लूँगा... 
इस भीषण गर्मी में 
पंखे चार...

बस इक छोटी सी थी -ख्वाईश...
की महाकाल में...
मेरी भी पूरी होती
फरमाइश...

देखता मैं भी...
तेरी सच्ची नुमाइश.
तेरी बादशाहत 
तेरी समझाईश। 
..
लेकिन -
ख्वाइश...
फिर रह गई...
बन कर..
दरख्वास्त!                                                        
जब देखा भीतर झाँक कर की -                             
नहीं है अपनी गुंजाइश!

देखें! अगले बारह बरस बाद या                                                              
कब किस जनम में...                                             
तू सुनता है...                                                     
और बुलाता है 
मुझे -अपने पास!

मैं नहीं आ पाया उज्जैन...
न दिन हैं... न रैन ..
बस मन बैचैन!

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