उज्जैन...
नहीं था..
मन का चैन!
मैं था बेहद-
बेचैन!
नहीं था..
मन का चैन!
मैं था बेहद-
बेचैन!
इतनी गर्मी...
कि -तन बेहाल!
कि -तन बेहाल!
तपती धरती...
और जेब फटेहाल!
ओह मेरे शंकर!
मैं न आ पाया..
उज्जैन!
मैं न आ पाया..
उज्जैन!
न मैं नागा.. न मैं साधू..
न कोई अखाड़ा...
न कोई नगाड़ा...
यदि करता खर्च तेरे
दर्शन में...
तो बच्चे
हो जाते ट्यूशन में पीछे ;
एक पखवाड़ा!
मैं एक गरीब...
आदमी...
सोचा की..
जितने पैसे में -
उज्जैन में होगा तेरा दीदार...
उतने में खरीद लूँगा...
आदमी...
सोचा की..
जितने पैसे में -
उज्जैन में होगा तेरा दीदार...
उतने में खरीद लूँगा...
इस भीषण गर्मी में
पंखे चार...
बस इक छोटी सी थी -ख्वाईश...
की महाकाल में...
मेरी भी पूरी होती
फरमाइश...
की महाकाल में...
मेरी भी पूरी होती
फरमाइश...
देखता मैं भी...
तेरी सच्ची नुमाइश.
तेरी बादशाहत
तेरी समझाईश।
..
लेकिन -
ख्वाइश...
फिर रह गई...
बन कर..
दरख्वास्त!
लेकिन -
ख्वाइश...
फिर रह गई...
बन कर..
दरख्वास्त!
जब देखा भीतर झाँक कर की -
नहीं है अपनी गुंजाइश!
देखें! अगले बारह बरस बाद या
कब किस जनम में...
तू सुनता है...
और बुलाता है
मुझे -अपने पास!
मैं नहीं आ पाया उज्जैन...
न दिन हैं... न रैन ..
बस मन बैचैन!
न दिन हैं... न रैन ..
बस मन बैचैन!

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