"बेफिक्री से जमींदोज़ हो जाता हूँ रोज़ रात...
अपने नेस्तनाबूत ख़्वाबों की दरगाह में...
तेरे बगैर!
अब तेरी मोहब्बत... अक्स बन...
लुभाती नहीं है ;
ज़िन्दगी को!
ज़िन्दगी के सफर में... मील के पत्थरों पर.. बदल गए हैं -
नाम,पते और मंज़िलें...
जहाँ तेरा नाम दर्ज था... अब वहाँ...
बच्चों की परवरिश और जिम्मेदारियां दर्ज हैं...
उच्च रक्तचाप और पसीने की बूँदों के साथ!
चलो यदा कदा...
किसी अमावस की काली रात...
जब दुनिया सो रही हो...
तो गुमशुदा बन...
ऐसे ही निकल आया करो ढूंढने...
किसी टूटे-फूटे खंडहरों की बस्ती में..
अपनी
गुमशुदा परछाइयों की भटकती हवाएं! "
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