Wednesday, May 18, 2016

डूबते सच और बचते झूंठ !

कुछ तो सच है  ....
सब कुछ झूंठा नहीं !

फूल चाहे जितना रोको  ...
तोड़े ही जाते हाँ न ?

कलियाँ चाहे जितना बचाओ  ...
मुरझातीं ही हैं न ?

प्यार चाहे जितना सच्चा हो  ...
दाग लगते ही हैं न ?

इज़्ज़त चाहे जितनी अच्छी क्यों न हो  ....
कभी न कभी धुल में मिलती ही है न ?

भगवान् चाहे जितने सच्चे क्यों न हों  ....
बेईमानों का साथ देते ही हैं न ?

मेहनत चाहे जितनी करो  ...
बेकार जाती ही है न ?

पुत्र चाहे जितना लायक हो  ...
बाप नालायक बोलता ही है न ?

सौंदर्य चाहे जितना अप्रतिम हो  ....
ढलकर मुरझाता ही है न ?

शरीर चाहे जितना स्वस्थ्य क्यों न हो  ...
बीमार तो होता ही है न ?

पूजा चाहे जितनी निष्काम क्यों न हो  ....
वरदान मांगते ही हैं न ?

आयुष्मान या अमर होने के चाहे जितने वरदान या आशीर्वाद मिलें  ....
मरना पड़ता ही है न ?

चाहे जितना सच बोलो  ....
झूंठ का दामन थामना पड़ता ही है न ?

जीवन में चाहे जितनीं खुशियां मिलें  ....
दुःख आलिंगन में लेता ही हैं न ?

"जोड़ी सलामत रहे !" की खूब  दुआयें मिलतीं हैं  ...
जोड़ी टूटती ही है न ?

जीवन के फलसफे को अंगीकार ...
समय चक्र को स्वीकार  ...
करना ही होगा  ....
और
चित्त  ... चित्ता और चिंता वश से बाहर की चीजें हैं  ...
और जिसने इस सच्चाई को मान लिया  ...
वह ख़ुशी ख़ुशी  ...
जुदा होगा  ...
हर जुदाई में -
अपनों से। "


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