Wednesday, May 25, 2016

बारिश की तल्खी !

मौसमों का बदलना और 
ज़िन्दगी का करवटें लेना 
हमेशा 
अतीत की याद दिला कर 
आँखों में नमीं छोड़ जाता है। 

बारिश का पहला दिन -
हिन्दुस्तान के कस्बे की ज़िन्दगी  ,,,
बिजली-बत्ती गुल  ...
अँधेरी रात  ...
और छाती से चिपकी बिटिया... 

पापा लाइट कब आएगी ?
पापा पानी कब बंद होगा ?
पापा बिजली से डर लगता है ?
जैसे -
बचपने के बालसुलभ अनुत्तरित प्रश्न। 

जो कभी मेरे अपने सवाल थे -अपने पापा से  ... 
आज पलट कर  ... 
मुझे अहसास करा रहे थे कि -
रुपहला बचपन गुज़र चूका है ;
बहुत पहले  .. 
और अब मैं बाप बन चूका हूँ 
दो प्यारे बच्चों का। 

आह !ये बारिश और घटाटोप रातें भी  .... 
कभी कभी  ... 
ले जाती हैं उस आँगन में  ... 
जो मैंने बिसरा दिया है  .... 
समय से  .... 
समझौते करते करते। 

डबल बैड में लेटे हुए  ... 
याद आतीं हैं -
वो बारिश में गाँव की खटोलियां  ... 
जहाँ धंस जाता था मेरा वज़ूद  ... 
पापा की छाती पर  ... 
एक टांग रख कर  ... 
और 
पापा रात भर ठीक करते रहते थे  ... 
उन छप्परों को या छेदों को  ... 
जहाँ से -
पानी टपकता था ;
इस अहसास के साथ कि 
शानू-आशीष के लिए 
अभी पक्का घर बनवाना है। 

आज समझ आया की  ..... 
बारिश के मौसम में  .... 
चाँद को छूते ये बादल   ..... 
यादों की तप्त बदली बन   ... 
क्यों बरसने को आकुल रहते हैं!

बिटिया को तो सुला दूंगा  ... 
उसके उत्तर देकर  .... 
लेकिन -
मुझे कौन सुलाएगा ;
मेरे उत्तर देकर ?

क्यों की -
मेरे उत्तर देने वाले तो  .... 
जा चुके हैं बहुत दूर  ... 
नए उत्तरों को खोजने  ... 
मुझे अकेला छोड़ के। 

बरसते बादल भला कभी ठहरे हैं किसी के पास ?
तो फिर ;
आशीर्वाद बरसाते ये माँ-पापा भी  ... 
कैसे ठहर जाते ;
मेरे पास ?



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