Saturday, May 7, 2016

उड़ने का वक़्त...

जवानियाँ होतीं तो..  कोयल और पपीहे की
टेर से...
चहक उठता मन....
पर
अब ढलते सूरज ने...  मंदिरों की घंटियाँ और मस्जिदों की अजान से कर ली है...
दोस्ती!!

बहती उम्र में...
खूब बहा......
बहुत दूर...
बहुत गहराई में... निर्द्वन्द निर्भीक!

पर
अब जब...
ढलती उम्र में...
उड़ने का वक़्त...
आया तो -
उड़ूंगा भी...
बहुत ऊँचा...
बहुत दूर...
अथाह आकाश में...
इस ब्रह्माण्ड से...
उस पार...
निर्द्वन्द निर्भीक!
निष्काम निष्पाप!

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