Friday, May 6, 2016

मालिक!!

मालिक!!
ख्वाइशें अगर होतीं...
तो तेरे सजदे से...
हो जातीं मुकम्मल!!

पर ज़िन्दगी की...
दरख्वास्तें...
लटक गई...
सलीब पे....
जबसे
मेरी मुस्कराहटों ने
अट्टहास का रूप लिया और
कामनाओं ने वासनाओं का लबादा ओढ़...
तेरी चौखट पर
आमद दी!

मैं भूल ही गया था..
तेरी हैसियत को...
की
तेरी नज़रों के सामने
सब बेपर्दा है और
तेरी लाठी...
बेआवाज़ है!

"आदम" से "इंसा"
कहलाने का
एक अदद मौका
और दे दे...
मेरे मौला!!

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