Sunday, May 29, 2016

इन्तिज़ार -दो बूंदों का!

कुछ ठण्डीं हवाएं...
कुछ बदलती फ़िज़ाएं..
बूँदों की बाट जोहती सुखी धरती..
बरस पड़ने की जगह तलाशते...
भूरे बादल...
और
आकाश को निहारतीं
थकी इंसानी आँखें...

बस दो बूँद से..
टिका संसार!

"दो बून्द" ग्रहण और
स्खलन -
नव काया का सृजन...
और
दो बून्द गंगा किनारे तर्पण -
जन्मजन्मांतर के चक्रव्यूह से मुक्ति!

इन्तिज़ार...
लम्बा इन्तिज़ार...

किसी को दो बून्द बरसने का...
तो किसी को बाढ़ में दो  बून्द रुकने का...

किसी को दो बून्द प्यार का...
तो किसी को दो बोल  मनुहार का...

किसी को आमंत्रण का...
तो किसी को स्वीकार का....

किसी को किसी
के गिरने का...
तो किसी को किसी के उठने का!

रफ्ता रफ्ता ज़िन्दगी...
तपता तपता जीवन...
बंज़र होती धरती... खंजर होते रिश्ते..
और ...
नश्तर होता मन !

कुछ ठंडे पड़ते रिश्ते....  कुछ आग उगलते मन..
वहीँ कुछ भूल सुधारते...
प्रगाढ़ होते बंधन...
तो कुछ आँख चुराते और लजाते तन!

कुछ व्यथित मन...
कुछ पतित मन...
कुछ सशंकित..
कुछ आतंकित...
कुछ संक्रमित....
और कलंकित...
मन...
आह!
ये कैसा रविन्द्र नाथ  बाबू का-
उपवन...
जन गन मन??

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